आधुनिकता एवं चमक दमक के इस युग में एक शिक्षक को घोड़े पर बैठकर सफर करना पड़ रहा है जी हाँ हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य डिंडौरी जिले के शिक्षक रतनलाल नंदा की जिन्हें सड़क नहीं होने की वजह से घोड़ा खरीदना पड़ा था और वो उसी घोड़े पर बैठकर प्रतिदिन 14 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर इलाके में शिक्षा की अलख जगाने का काम कर रहे हैं। शिक्षक रतनलाल नंदा जन्म से ही दिव्यांग हैं और वो डिंडौरी जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर लुढरा गांव के निवासी हैं। गांव से 7 किलोमीटर दूर जिस स्कूल में वो पदस्थ हैं वहां तक पहुंचने के लिये सड़क ही नहीं है,जंगली ऊबड़खाबड़ रास्तों एवं नदी नालों को पार करके ही स्कूल तक पहुंचा जा सकता है लिहाजा शिक्षक ने घोड़ा खरीद लिया और घर से स्कूल का सफर वो पिछले 15 सालों से घोड़े पर बैठकर कर रहे हैं। हैरत की बात तो यह है कि अधिकारी और नेता सड़क निर्माण कराने की बजाय शिक्षक को सम्मानित करने की बात कर अपनी जवाबदारियों से पल्ला झाड़ते नजर आ रहे है ।प्राथमिक शाला संझौला टोला में पदस्थ दिव्यांग शिक्षक रतनलाल नंदा का एक पैर जन्म से ही बेकार है लेकिन अपने कर्तव्यों को पूरा करने उन्होंने कभी अपनी दिव्यांगता को आड़े नहीं आने दिया,तमाम चुनौतियों को मात देते हुये घोड़े के सहारे वो प्रतिदिन स्कूल पहुंचकर बच्चों को पढ़ाते हैं ताकि नौनिहालों का भविष्य संवर सके। घर से स्कूल तक 7 किलोमीटर का दुर्गम सफर तय करने के लिये उन्हें घर से दो घंटे पहले निकलना पड़ता है और स्कूल की छुट्टी के बाद वो देर शाम घर पहुँच पाते हैं। तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि शिक्षक और घोडा कितनी मुश्किलों को पार करके आवाजाही करते हैं,सफर के दौरान कई बार ऐसे स्थान भी हैं जहां घोड़े की हिम्मत भी जवाब दे जाती है तब शिक्षक घोड़े का सहारा बनकर उसे पार लगाते हैं। शिक्षक ने बताया कि उन्होंने और ग्रामीणों ने भी कइयों बार सड़क बनाये जाने की गुहार नेता और अधिकारीयों से लगाई है लेकिन अबतक किसी ने उनकी सुध नहीं ली है।  
 संझौला टोला गांव के लोग शिक्षक रतनलाल की जमकर तारीफ़ तो करते हैं लेकिन खंडहर चुके भवन में लग रहे स्कूल एवं इलाके में मूलभूत सुविधाओं के अभाव को लेकर अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। 
वही जिले के जवाबदार अधिकारी और नेता अपनी नाकामियों को छिपाने शिक्षक की तारीफों के पुल बांध रहे हैं इसमें कोई शक भी नहीं है कि शिक्षक रतनलाल सम्मान के वास्तविक हकदार हैं और उनके जज्बे को हम भी सलाम करते हैं लेकिन स्कूल भवन की दुर्दशा,सड़क,बिजली और पानी जैसे मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जीवनयापन करने वाले ग्रामीणों की समस्या का निदान कौन करेगा ? यह एक बड़ा सवाल है।