*✍️बागी कलम:-*  प्रतीक को जलाकर क्या हम बुराई को ख़त्म कर पाए है.? आज हर तरफ फैले भ्रष्टाचार और अन्याय रूपी अंधकार को देखकर मन में हमेशा उस उजाले को पाने की चाह रहती है जो इस अंधकार को मिटाए। कहीं से भी कोई आस न मिलने के बाद हम अपनी संस्कृति के ही पन्नों को पलट आगे बढ़ने की उम्मीद ढ़ूढ़ते है।

*सांकेतिक रावण का प्रश्न:-*
तुम  मर्यादा  पुरुषोत्तम हो, करुणानिधान कहलाते हो।
दुष्टों का  करते  हो विनाश, धरती से  पाप  मिटाते  हो।
दुनियाँ का  सारा पाप क्या, मुझ  में  ही  दिखलाया  है।
केवल मुझ पर ही धनुबाण, तुमने  हर  बार  उठाया  है।
पहले सागर उस पार मिली फिर सागर  इस पार मिली।
अपराध किया था एक बार पर सजा हजारो बार मिली।
मैं रक्त संस्कृति का स्वामी, मैंने तो अपना  काम किया।
हे आर्यपुत्र नाहक मुझको, इस दुनिया ने बदनाम किया।
तुम नायक हो मैं खलनायक, बेशक मुझ पर  वार करो।
भारत  के  क्रूर  दरिंदों  का, लेकिन  पहले  संहार  करो।

*विचार योग्य:-*
जरूरी है अपने जहन में "राम" को जिन्दा रखना,
क्योंकि पुतले जलाने से कभी *रावण* नहीं मरते।
● प्रतीक को जलाकर क्या हम बुराई को ख़त्म कर पाए हैं.! दशहरा उत्सव अपने उद्देश्य से भटक गया है। अब दशहरे पर केवल शोर होता है और कुछ घंटों का उत्साह, मगर लोग आज भी उन बुराईयों के बीच जीते हैं।