त्रेतायुग में जन्मी माता सीता और उनके बाद द्वापर युग में जन्मी राधा रानी के जीवन में कई समानताएं हैं। दोनों ही दैवीय स्वरूप इस पृथ्वी पर कष्ट भोगते हुए प्रेम और त्याग की मूर्ति के रूप में प्रसिद्ध हुईं। लेकिन क्या कभी आपने गौर किया कि इनके पृथ्वी पर जन्म लेने के बाद से बैकुंठ लोक में वापसी तक इनके जीवन की कौन-कौन सी घटनाओं में समानता है। यहां जानें…
राधा रानी और देवी सीता दोनों ही अपनी मां की कोख से नहीं जन्मी थीं। राधा रानी नवजात बच्ची के रूप में प्रकट हुई थीं और देवी सीता कुंभ से निकली थीं। राजा दशरथ के हल की सित से टकराने के कारण इनका नाम सीता रखा गया था।
राधा रानी और सीता मैया दोनों का ही लालन-पालन इनके जन्मदाताओं ने नहीं किया था। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, राधा तो गोलोक से धरती पर पधारी थीं, वहीं देवी सीता के असल माता पिता को लेकर कई कथाएं हैं। ऐसे में इन दोनों का लालन-पालन करनेवाले माता पिता और जन्मदाता अलग-अलग थे।
राधा रानी ने कान्हा के साथ रास तो रचाया लेकिन इनका विवाह कृष्णा से नहीं हो सका और इन्हें पृथ्वी लोक पर विरह की वेदना को सहन करना पड़ा। वहीं देवी सीता का रामचंद्रजी से स्वयंवर तो हुआ लेकिन रावण द्वारा हरण कर लिए जाने के बाद वह लंबे समय तक रामचंद्रजी से दूर रहीं फिर रामचंद्रजी द्वारा वनवास दिए जाने के कारण उन्हें बिछोह की पीड़ा सहन करनी पड़ी।
राधा के पृथ्वी लोक छोड़ने से पहले श्रीकृष्ण उनसे मिलने आए हुए थे। राधा रानी ने कान्हा से कहा कि वह उनकी मुरली की धुन सुनते हुए धरती से विदा होना चाहती हैं। तब कान्हा ने मुरली बजाई और राधा गोलोक वापस चली गईं। ऐसे ही सीता मैया भी श्रीराम भगवान के सामने ही पृथ्वी में समा गईं थी।
देवी राधा और सीता मैया दोनों ही लक्ष्मी माता का अवतार मानी जाती हैं। जैसे, श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों भगवान विष्णु के अवतार हैं। पालनकर्ता की अर्धांगिनी होने के कारण देवी लक्ष्मी ने मानव जन्म के कष्ट भगवान विष्णु को अकेले नहीं झेलने दिए और उनके साथ पृथ्वी लोक पर अवतरित हुईं।
चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम ने जन्म लिया था इसलिए इसे रामनवमी भी कहते हैं। वहीं वैशाख मास के शुक्ल पक्ष नवमी तिथि सीतानवमी के रूप में पूजी जाती है। क्योंकि इस दिन देवी सीता प्रकट हुईं थी। दूसरी तरफ श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद की अष्टमी तिथि को हुआ था, इसी कारण इसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहा जाता है। तो देवी राधा भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को प्रकट हुईं थी इसलिए इसे राधाष्टमी कहा जाता है। अर्थात देवी राधा और सीता मैया दोनों ही अलग-अलग युग में उसी तिथि को प्रकट हुईं, जिस तिथि को स्वयं भगवान ने अवतार लिया था।