पुलिस अजब है पुलिस गजब है बिखरा विकार है ऐसा परिवार है
अजीत मिश्रा की कलम से  
 
इस समय जिले के व्हाट्सएप ग्रुपो में अनूपपुर एडिशनल एस पी वैष्णव शर्मा की एक कविता खूब वायरल हो रही है जो देश प्रदेश के पुलिस कर्मियों के हालात बयान करती है सोशल मीडिया पर उनके द्वारा पोस्ट की गई विभिन्न व्हाट्सएप ग्रुपो में पोस्ट की गई इस कविता की शुरुआत ही प्रदेश सरकार के पर्यावरण विभाग के विज्ञापन मध्यप्रदेश अजब है मध्यप्रदेश गजब है के तर्ज पर पुलिस के हालात को व्यंग्यात्मक लहजे में बयान करते हुए लिखा है की "पुलिस अजब है पुलिस गजब है ,लगता मालामाल है शक्ति का भंडार है " आगे पुलिस और उनके परिवार की वास्तविक हालात से अवगत कराते हुए कविता में लिखा है कि " बिखरा विकार है ऐसा परिवार है " कविता  में के एक लाइन में कहा गया है जिस लाइन में किस तरीके से विभाग में आपसी षडयंत्रो का इशारो इशारो में खुलाशा किया गया है वैष्णव शर्मा अपनी कविता में लिखा है कि
"वर्दी का शिकार है ,वर्दी ही शिकार है "
एक और लाइन में एडिशनल एस पी वैष्णव शर्मा ने लिखा है कि 
"कंचन कामिनी वार है ,कीर्ति  तार तार है ,अकड़न जंजाल है उलझन भरमार है""
एक और लाइन इस कविता की गौर करने वाली है जिसमे पुलिस कर्मी किन हालातो में काम करते है बयान किया गया है ""षणयंत्र का संसार है यही तो विचार है "" पर एक लाइन में उन्होंने आध्यात्मिक्ता पर जोर देते हुए लिखा है कि "विनम्रता श्रंगार हो और सौम्यता अलंकार हो ,सत्य का भंडार हो 
 और कविता का अंत मे पुलिस के हालात सुधारने की अपील की है "पुलिस का उद्धार हो पुलिस का उद्धार हो ""  पेश है अनूपपुर में पदस्त एडिशनल एस पी वैष्णव शर्मा की पूरी कविता 
""वैष्णव शर्मा की सुर्ख स्याही से प्रस्फुटित स्व रचित समसामयिक कविता---
 
पुलिस अजब है। 
पुलिस गजब है। 
लगता मालामाल है। 
शक्ति का भंडार है। 
लेकिन, 
बिखरा विकार है। 
ऐसा परिवार है। 
वर्दी का शिकार है। 
वर्दी ही शिकार है। 
कंचन कामिनी वार है। 
कीर्ति तार तार है। 
अकडन जंजाल है। 
उलझन भरमार है। 
षडयंत्र का संसार है। 
यही तो आचार है। 
यही तो विचार है। 
बस, 
विनम्रता श्रृंगार हो। 
सौम्यता अलंकार हो। 
सत्य का भंडार हो। 
पुलिस का उद्दार हो। 
पुलिस का उद्दार हो।
मेरा मकसद इस कविता का विश्लेषण कर कोई प्रपोगंडा खड़ा करना नही है पर आप जरा सोचिए कि क्या देश की वर्तमान परिस्थितियों में हम हमारे आंतरिक सुरक्षा के इन प्रहरियों और उनके परिवार को वो माहौल दे पा रहे है जिसमे उनके और उनके परिवार के मानवाधिकारो की रक्षा हो सके जरा सोचिए कम सुविधाओ और विकट परिस्थितियों के बावजूद भारत की माताए अपने बेटों को सेना और पुलिस में भर्ती के लिए खुशी खुशी भेज देते है और हम  बदले में उनसे सुपर हीरो जैसे परिणामो को उम्मीद करते है पर क्या हम कभी उनकी कठिनाइयों और परेशानियों के बारे में सोचते है अपराधियों का कश्मीर में आतंकवादियों अलगाव वादियों पत्थर बाजो के लिए देश और विश्व के मानवाधिकार संगठनों को तमाम दलीले देते हुए हम आप अक्सर देखते है पर क्या कभी इन पुलिस कर्मियों और सेना के सिपाहियों और उनके निर्दोष परिवारों और अबोध बच्चो के मौलिक अधिकारों और  मानवाधिकारो के हनन जो देश एयर प्रदेश के सरकारों के गलत और अमानवीय नीतिओ के करण लगातार हनन हो रहा है इसकी चिंता कभी करते है यह विचारणीय प्रश्न है कही ऐसा ना हो कि पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ की तरह फ्रस्टेशन का शिकार हो कर इन आंतरिक सुरक्षा कर्मियों के परिवार के महिलाये बच्चे बुजुर्ग सड़को में उतर जाए और यहाँ भी एक आंदोलन खड़ा हो जाये मैं इन समाज और देश के सुरक्षा प्रहरियों के संयम को मेरा प्रणाम वास्तव में पुलिस अजब है पुलिस गजब है बिखरा विकार है और ऐसा परिवार है