यू पी में प्रियंका दांव ...जरुरी या मजबूरी ?
 
दोधारी तलवार पर गाँधी परिवार।
 
( मनोज द्विवेदी, कोतमा - अनूपपुर)
 
अनूपपुर / भारत में २०१९  आम चुनाव से चार माह पूर्व राष्ट्रीय कांग्रेस का आला गांधी परिवार राजनीति की दो धारी तलवार पर आ टिका है।  रॉबर्ट वाड्रा की धर्मपत्नी श्रीमती प्रियंका वाड्रा तथा म प्र के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया  को चुनाव से  ठीक पहले राष्ट्रीय कांग्रेस का महासचिव घोषित कर  उत्तरप्रदेश के आधे- आधे हिस्से का  प्रभारी बनाये जाने से राजनैतिक समीक्षकों को नया  मुद्दा मिल गया है। इसमें प्रियंका वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश के ४० जिलों का प्रभारी बनाया गया तो सिंधिया को शेष पश्चिमी उत्तरप्रदेश का। दोनों महासचिवों की नियुक्ति के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने पत्रकारों के सामने अपनी लाडली बहन  प्रियंका की तारीफों की झडी लगा दी। उन्होने विश्वास जताया कि प्रियंका को महासचिव बनाए जाने से उत्तर प्रदेश मे कांग्रेस खोया आधार पा सकेगी। राहुल इस अवसर पर  म प्र मे मुख्यमंत्री पद से बाल बाल चूके ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिये दो शब्द भी नहीं कहा। 
 
** खैर ! राहुल गांधी ने दो महासचिव नियुक्त कर के दोनो को उत्तरप्रदेश का प्रभारी बना कर अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है। ८० सीटों वाली उत्तरप्रदेश मे २०१४ के चुनाव मे बस अमेठी ,रायबरेली सीट ही कांग्रेस बचा पाई थी। वह भी तब जब सपा ,बसपा ने वहाँ अपने प्रत्याशी खडे नहीं किये थे। विधानसभा चुनाव में यहाँ चालीस का आंकडा पार कर पाना मुश्किल हो गया था। यहां कांग्रेस संगठनात्मक रुप से बहुत कमजोर है । 
भले ही प्रियंका - सिंधिया की नियुक्ति को पार्टी बहुत पॉजिटिव ले रही हो , सवाल 
इन नियुक्तियों की टायमिंग तथा असर पर  भी है। एक ओर उ प्र मे बसपा - सपा का गठबन्धन पूरा हुआ । जिससे कांग्रेस को पूरी तरह बाहर रखते हुए उसे अमेठी ,रायबरेली तक सीमित करते हुए प्रदेश मे उसकी सीमा बतलाने की कोशिश की गयी । तो दूसरी ओर म प्र राजनीति के दो धुर विरोधी नेताओ शिवराज सिंह चौहान तथा ज्योतिरादित्य सिंधिया की आन्तरिक बैठक ने लोगों को तब कयासबाजी के अवसर सुलभ करवा दिये ,जब भाजपा - कांग्रेस दोनो एक दूसरे के विधायकों के पाला बदल के दावे कर रहे हों । इस बैठक के ४८ घंटे के भीतर सिंधिया को प्रदेश से बाहर की कमान देकर काम पर लगा दिया गया। 
    उ प्र को दो हिस्सों में बांट कर भले ही दो महासचिव बना दिये गये हों , चर्चा सिर्फ एक महासचिव की हो रही है। प्रियंका वाड्रा को कोई तुरुप का पत्ता बतला रहा है तो कोई कह रहा है कि वह देश की रानी बन जाएगी। कुछ लोगों को वह देश का डंका लग रही हैं तो कुछ दलों  के लिये किसी डंक से कम नहीं । कांग्रेस के कुछ समर्थकों को प्रियंका में इंदिरा गाँधी की छवि दिखती है तो भाजपा नेता चाकलेटी चेहरों के बूते वोट न मिलने की बात कहते हैं। 
    कुछ लोग मानते हैं कि बसपा - सपा गठबन्धन से दो सीट की भीख मिलने , गठबन्धन से बाहर किये जाने से अपमानित कांग्रेस का स्वाभिमान जाग गया है ऒर उसने उ प्र के अन्य छोटे ,अति छोटे दलों के साथ एक ऒर गठबन्धन कर सभी सीटों पर भाजपा, बसपा- सपा गठबन्धन के विरुद्ध चुनाव को त्रिकोणीय बनाने का निर्णय लिया है। जबकि कुछ अन्य समीक्षक मानते हैं कि यह बसपा - सपा - कांग्रेस की आन्तरिक रणनीति का हिस्सा है कि बसपा - सपा गठबंधन अपने वोट बैंक संभाले तथा कांग्रेस भाजपा के सामान्य वोट बैंक पर सेंध लगाए। उद्देश्य दोनों का भाजपा को अधिकतम नुकसान पहुंचाने का है।  
समीक्षको का एक ग्रुप यह भी मानता है कि राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के सपनों पर मायावती - अखिलेश यादव की महत्वाकांक्षा पाला मार सकता है। 
*** प्रियंका राजनीति में   सुविधानुसार पहले से ही  खासा दखल रखती रही  हैं। इंदिरा जी से नैन नक्श मिलने व उन जैसी हेयर स्टाइल रखने के अलावा वैसी प्रतिभा के दर्शन अब तक नहीं हुए हैं। इंदिरा जी की राजनैतिक समझ , गूंगी गुडिया की डरावनी छवि, धारदार भाषण शैली ,उनके साहस का एक अंश भी प्रियंका में नहीं है। रायबरेली व अमेठी लोकसभा क्षेत्र में वो चुनाव प्रबंधन तथा प्रचार का काम करती रही हैं। अब उन्हे महासचिव के रुप मे पूर्वी उ प्र की चालीस सीटों का जिम्मा सौंपा गया है तो  उन्हे तुरुप का इक्का मानने वालों के लिये यह बन्द मुट्ठी खुलने जैसा है। 
*** तुरुप के इक्के को  ( यदि प्रियंका इंदिरा की प्रतिमूर्ति हैं तो ) , उनकी  योग्यता का राष्ट्रीय स्तर पर अन्य राज्यों मे अभी तक उपयोग क्यों नहीं किया गया  या उन्हे महज ४० सीटों तक सीमित क्यों किया गया ? 
  जैसा कि राहुल ने कहा है कि यह प्रभार महज लोकसभा चुनाव तक नहीं है ,मतलब सिंधिया - प्रियंका की जोडी विधानसभा चुनाव तक प्रदेश में साथ काम करने वाली है। जाहिर है कि प्रदेश मे अपने पैरों पर खडे होने को तत्पर कांग्रेस के लिये यह अच्छा कदम हो सकता है। लगभग तीन दशक पहले प्रदेश के ब्राह्मण ,ठाकुर ,मुसलमान ,पिछड़ा वर्ग , दलितों में अपना प्रभाव नष्ट कर चुकी कांग्रेस के लिये अन्य क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों से मुक्त होने ,अपने पैरों पर खडा होने का एक अवसर है। 
    बिना संगठनात्मक ढांचे के ऐसा हो सका या लोकसभा में कांग्रेस बसपा - सपा के बराबर या भाजपा से अधिक सीटें जीत सकी तो इसे प्रियंका इफेक्ट माना जाएगा। यदि नहीं तो
 प्रियंका कार्ड पिटने का मतलब कांग्रेस से गाँधी युग का अन्त भी हो सकता है। 
   **‌* देश का बहुत बडा वर्ग राहुल गांधी से बहुत उम्मीद नहीं रखता है लेकिन धुर कांग्रेसियों के लिये वह अन्तिम उम्मीद भी हैं। २०१९ में पराजय होने की दशा में पार्टी को संभाले रखने के लिये एक अन्य चेहरे की जो तलाश थी , वह प्रियंका से पूरी होती दिखती है। कहने को पांच राज्य , वास्तव में तीन राज्यों म प्र ,  छ ग, राजस्थान में भाजपा की पराजय ( न कि कांग्रेस की जीत ) के अलग अलग कारण हैं। यह मानना होगा कि इन राज्यों की जीत  सिर्फ राहुल गांधी की योग्यता ,उनकी लहर से जीती गयी हो ,ऐसा नहीं है। यह सिर्फ कांग्रेस का मनोबल तो बढा सकता है , राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता नहीं । भले ही राफेल पर राहुल ने मोदी को घेरने की भरसक कोशिश की हो , वे संसद से सुप्रीम कोर्ट तक अपनी व पार्टी की भद्द पिटवा चुके हैं। मोदी सरकार की ईमानदार छवि पर बिना आधार कीचड उछालने , प्रधानमंत्री को चोर कहने कॆ प्रयासों ने देश के बडे तबके, विशेष कर पढे लिखे युवा वर्ग में राहुल की छवि झूठे ,अविश्वसनीय व्यक्ति की बना दी है। गरीब सवर्ण आरक्षण से देश मे आर्थिक आधार पर आरक्षण का मार्ग प्रशस्त कर मोदी ने सामान्य जाति के लोगों को खुश करने की कोशिश की है।  अपनी ईमानदार छवि को बनाए रखने में सरकार सफल रही है। 
  मुद्दा विहीन कांग्रेस को  विपक्षी एक जुटता तथा किसान कार्ड , युवा वर्ग पर  भरोसा है। राहुल गांधी हर मॊके पर युवाओं से अपील करते इसी लिये देखे जा रहे हैं।   विपक्ष के महागठबंधन में भी मायावती, शरद पवार , अखिलेश यादव ,ममता बैनर्जी के प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पर तब भारी पडेंगे जब वे सबसे बडे दल के रुप मे चुन कर आ पाएं।        इसके लिये उन्हे उ प्र में बडी जीत की दरकार है। उ प्र मे २००९ मे सोनिया - राहुल की तमाम कोशिशों के बाद कांग्रेस ने २१ सीटें जीती थीं जो २०१४ की मोदी लहर में ०२ पर जा टिकी। अभी न सोनिया का जादू बचा है न राहुल पर लोगों का भरोसा। 
     ऐसी स्थिति में चुनाव से कुछ माह पूर्व प्रियंका कार्ड खेलने से पार्टी को लाभ - नुकसान दोनों होता दिख रहा है। लाभ यह कि प्रियंका के आने से पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह निश्चित रुप से बढेगा , पार्टी को इसका लाभ भी होगा। दूसरा , यदि प्रियंका को पार्टी ने उ प्र मे अगले मुख्यमंत्री पद का चेहरा बना दिया तो सबसे अधिक नुकसान बसपा ,सपा को होना तय है। तब प्रदेश में भाजपा को कांग्रेस सीधे कडी टक्कर दे सकती है। 
   नुकसान यह कि लोग राहुल को चुका हुआ अध्याय भी मान सकते हैं। प्रियंका हिट हों यदि यह संभावना है तो पिटने की दशा मे एक इतिहास का अन्त भी हो सकता है।   
    अस्सी के दशक की  कांग्रेस ( इंदिरा ) २०१८ तक पहुंचते पहुंचते पहले कांग्रेस ( राहुल)  ऒर फिर २०१९ में कांग्रेस ( प्रियंका) बनाई जा रही है तो क्या देश यह मान ले कि कांग्रेस पर कांग्रेस का ही भरोसा डिग गया है। ऐसे में नीति पर सवाल यह है कि प्रियंका को एक प्रदेश की चालीस सीट तक सीमित क्यों किया गया ? क्या वह राष्ट्रीय स्तर पर प्रचार करने के काबिल नहीं  या उनसे राहुल गांधी के लिये कोई खतरा महसूस हो रहा है ?  परिवारवाद के आरोपों को दर किनार भी करें तो जीत की संभावनाओं के बीच आशंका तुरुप के इक्के कॆ पिटने की भी है। तब देश को यह मान लेना होगा कि लीज पर ली गयी परिवार की  गांधीगिरी अब अवसान की ओर है। गांधी परिवार के नेतृत्व में यह अंतिम आम चुनाव भी हो सकता है । 😎