वक्त है बदलाव का....आखिर ऐसी बेशर्मीयत कब तक? राजकमल पांडेय (आजाद)
जब बेशर्मीयत का पैमाना छलक जाता है, तो फिर बदन पे ओढ़ा कोसे का वस्त्र भी उसे छिपा नही पाता है। किसी भी परिवार में जब शोक होता है, तो 13 दिन तक कोई कार्य नही किया जाता है। ऐसा हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है। इसके बाद देश की समस्त पार्टियां ऐसे नियमावली पे अपने बुलन्द भाषण लाद देते है और कहते है कि पार्टियां एक परिवार की तरह है। हर सुख में सुखी हैं, तो हर दुःख में शरीक भी हैं। अपितु ऐसे भाषण इज़ात करना पार्टियों के हुक़ूमनंदो को वोट के रूप में लाभान्वित बस होने के लिए है, उसका अक्षरसः पालन में पसीने छूट जाते हैं।
जो पार्टी देढ़ दशक तक सत्ता से दूर रहा हो एका-एक सत्ता मिलने से दिमाग मे बौखलाहट सवार हो गया। अभी हाल ही में शहर के राजनीति के पितृ पुरूष के शोक में समूचा संभाग डूबा हुआ था। ऐसा हम लोग मानते हैं हमारे नवागत विधायक की हिन्दू ग्रंथ की नियमावली कुछ और ही कहता है। एक ओर पूरा शहर राजनीति के पितृ पुरुष को श्रद्धांजलि देने में लगा था, तो उधर विकास पुरुष अपना देंह मोती चूर के लड्डूओं में तौलवा कर श्रद्धांजलि दिया। शोक की संवेदना व्यक्त करने महज 5 मिनट को गए और उनके कदम वहां से वापस होते ही ठुमके देखने चल पड़ा। जी हां वही विकास पुरुष जिन्हें नगर के पूर्व उपधिराज ने छिंदवाड़ा मॉडल के पुस्तक विमोचन में युग पुरुष का ख़िताब दिया था। पार्टी शोक में डूबा हुआ था, यह भाव उन्हीं के पार्टी के एक युवा विधायक ने श्रद्धांजलि देकर व्यक्त किया। अपितु विकास पुरुष को नृत्य देखना था, उनका देंह मोतीचूर की लड्डुओं में तौलवाने को फड़फड़ा रहा था।
अनूपपुर जिले के राजनीतिक पितृ पुरुष ने इन्हीं विकास पुरुष को राजनीति में हल्के-हल्के पैरों से चलना सिखाया था। राजनीति के ‘‘क’’ से लेकर ‘‘ज्ञ’’ तक की पूरी वर्णमाला पढ़ाया था। जिस पर वही विकास पुरुष ने अपने राजनीतिक गुरु को श्रद्धांजलि देने का नायाब तरीका खोज निकाला। गुरु का देहांतवास छोटा हो गया विकास पुरुष के सम्मान समारोह के आगे। जब उधर विकास पुरुष अपने अधेड़ उम्र की जवानी को मोतीचूर के लड्डुओं में तौलवा रहे थे, तो शमशान घाट में उनके राजनीति गुरु को श्रद्धांजलि दिया जा रहा था। यह देख शर्म भी पानी-पानी हुआ अपितु विकास पुरुष को तनिक भी आत्मग्लानि महसूस नही हुआ। 
ऐसी भी क्या जल्दी थी विकास पुरुष अपने अधेड़ उम्र की जवानी वाले देंह को तौलवाने का काम अपने राजनैतिक गुरु के राख ठंडा हो जाने के बाद किया होता, अपने गुरु को प्रयागराज थोड़ा पहुंच जाने दिया होता। खुशी-खुशी 13 ब्राम्हणों को पांत में बिठाकर खिला देने दिया होता, टीका-चन्दन माथे में पोतकर 11-11 रुपये, गीता, माला, चन्दन, रोली वगैरा दान कर लेने दिया होता। फिर आप ठुमके देखने जाते भी तो किसी को कोई अचरज नही होता। आप के राजनैतिक गुरु का देहांतवास हुआ था, कार्यक्रम स्थगित भी करवाया जा सकता था। अरे एक बात तो हम भूल गए थे, आपने तो अपने ही पार्टी के पूर्व सांसद के देहांतवास में जाकर श्रद्धाजंली अर्पित नही किया था। आप में मनुष्य होने के गुण शायद नही है। और ख़ामोखा यह जनता आपको बारम्बार कुर्सी देकर आपकी विषैली मुस्कान में मोहित रहती थी। जो हरकत आपने अपने राजनीतिक गुरु के देहांतवास में किया है, यह देख काल ने भी अपना गाल बजाया होगा।