एक मुकदमे से सरकार को मिलती है 500 रुपये फीस, लेकिन न्यायालय पर खर्च सिर्फ 87 रुपये फिर भी अनूपपुर मे भवन विहीन न्यायालय!

न्यायपालिका के बजट और खर्च को लेकर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, अनूपपुर जिला न्यायालय भवन का मामला भी सुनवाई में उठा

अनूपपुर। न्यायपालिका के बजट, न्यायालयों को मिलने वाली राशि और एक मुकदमे पर होने वाले वास्तविक खर्च को लेकर हाईकोर्ट में हुई सुनवाई ने व्यवस्था के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने ला दिया है। प्रकाशित समाचार के अनुसार, हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सरकार को एक मुकदमे से कम से कम 500 रुपये कोर्ट फीस के रूप में प्राप्त होते हैं, जबकि एक मुकदमे पर न्यायालय का खर्च लगभग 87 रुपये बताया गया है।

अनूपपुर जिला न्यायालय भवन  के मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने  न्यायपालिका के बजट आवंटन और उसके इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले खर्च को लेकर गंभीरता दिखाई। डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार से अन्य विभागों की तुलना में न्यायपालिका को आवंटित बजट का पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

अनूपपुर जिला न्यायालय भवन का मामला

सुनवाई के दौरान अनूपपुर जिले में कोर्ट भवन के निर्माण का मामला भी चर्चा में आया। समाचार के अनुसार, अनूपपुर जिले में कोर्ट का संचालन किराए के भवन में किए जाने की स्थिति का उल्लेख किया गया। बताया गया कि 3 फरवरी 2021 से नए कोर्ट भवन के निर्माण का मामला लंबित है।

मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किए जाने और सुनवाई के दौरान अधिकारियों की मौजूदगी का भी उल्लेख समाचार में किया गया है। अनूपपुर की ओर से अधिवक्ता वासुदेव चटर्जी द्वारा दायर जनहित याचिका में न्यायालय के समक्ष जिले की न्यायिक व्यवस्था और भवन संबंधी स्थिति रखी गई।

किराए के भवन में न्यायालय, सुविधाओं पर सवाल

अनूपपुर जिला न्यायालय के लिए पर्याप्त एवं उपयुक्त भवन की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। न्यायालय यदि किराए के भवन में संचालित हो रहा है तो इससे न्यायिक कार्य के लिए आवश्यक सुविधाओं, कर्मचारियों की व्यवस्था, पक्षकारों की सुविधा और न्यायिक अधोसंरचना को लेकर स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।

ऐसे में हाईकोर्ट में यह मामला उठना अनूपपुर के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि नए न्यायालय भवन के निर्माण की प्रक्रिया वर्षों से लंबित है तो संबंधित विभागों के बीच समन्वय और बजट आवंटन की स्थिति पर भी सवाल खड़े होते हैं।

‘न्यायपालिका’ को महज एक विभाग मानने पर आपत्ति

सुनवाई के दौरान न्यायपालिका के लिए ‘डिपार्टमेंट’ शब्द के इस्तेमाल पर भी आपत्ति जताई गई। न्यायालय की ओर से यह बात सामने रखी गई कि न्यायपालिका संविधान का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, इसलिए उसे सामान्य विभाग की श्रेणी में रखकर नहीं देखा जाना चाहिए।

यह टिप्पणी न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी आवश्यकताओं को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। न्यायालयों के लिए पर्याप्त बजट, भवन, कर्मचारियों और अन्य आधारभूत सुविधाओं को न्यायिक व्यवस्था की प्रभावशीलता से जोड़कर देखा जाता है।

500 रुपये की फीस और 87 रुपये खर्च का अंतर क्यों?

एक मुकदमे से 500 रुपये या उससे अधिक कोर्ट फीस प्राप्त होने और उसी मुकदमे पर लगभग 87 रुपये खर्च होने का आंकड़ा सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि न्यायपालिका को मिलने वाले संसाधनों और उसके वास्तविक खर्च के बीच संतुलन किस प्रकार तय किया जाता है।

यह अंतर केवल राशि का मामला नहीं है, बल्कि न्यायिक अधोसंरचना और बजट की प्राथमिकताओं से भी जुड़ा हुआ है। अदालतों में बढ़ते मुकदमों के बीच यदि न्यायालयों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं तो इसका सीधा असर न्यायिक कार्य की गति और आम नागरिकों को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ सकता है।

हाईकोर्ट की सख्ती से अनूपपुर को उम्मीद

अनूपपुर जिला न्यायालय भवन का मामला लंबे समय से लंबित रहने के कारण स्थानीय स्तर पर भी चिंता का विषय रहा है। अब जब यह मुद्दा हाईकोर्ट की सुनवाई में सामने आया है, तो जिले के लोगों को उम्मीद है कि न्यायालय भवन निर्माण की प्रक्रिया में तेजी आएगी और लंबित प्रशासनिक एवं वित्तीय अड़चनों का समाधान होगा।

फिलहाल इस मामले में हाईकोर्ट की आगे की कार्रवाई और राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले बजट एवं भवन निर्माण संबंधी ब्यौरे पर नजर रहेगी। यदि न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई होती है तो अनूपपुर को आधुनिक एवं पर्याप्त सुविधाओं से युक्त जिला न्यायालय भवन मिलने की राह साफ हो सकती है।