किसी को न्याय दिलाना पद का दुरुपयोग नहीं, जिम्मेदारी निभाना है-- मनोज शुक्ला
किसी को न्याय दिलाना पद का दुरुपयोग नहीं, जिम्मेदारी निभाना है-- मनोज शुक्ला
संपादकीय
लोकतंत्र में किसी जनप्रतिनिधि की असली पहचान उसके पद, सुरक्षा घेरे या सत्ता के गलियारों में उसकी पहुंच से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह आम नागरिक के दर्द और अन्याय के सामने कितनी मजबूती से खड़ा होता है। यदि कोई नागरिक घायल है, उसकी शिकायत दर्ज नहीं हो रही है और उसका परिवार न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है, तो उसके पक्ष में आवाज उठाना पद का दुरुपयोग नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन के दौरान साहिल लोचब के पैलेट गन से घायल होने के मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया जाना इसी सवाल को सामने लाता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, एफआईआर दर्ज होने से पहले राहुल गांधी घायल साहिल लोचब और उसके परिवार के साथ संसद मार्ग स्थित डीसीपी कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे और न्याय की मांग की। उनका कहना था कि घटना को एक महीना बीत चुका है, लेकिन साहिल के शरीर में अभी भी पैलेट के छर्रे मौजूद हैं।
यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होना चाहिए कि राहुल गांधी धरने पर क्यों बैठे? बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि एक घायल नागरिक की शिकायत दर्ज कराने में इतना समय क्यों लगा?
अगर किसी व्यक्ति के शरीर में आज भी छर्रे मौजूद हैं, अगर उसका परिवार न्याय की उम्मीद लेकर पुलिस के पास पहुंचता है और अगर एफआईआर दर्ज कराने के लिए किसी बड़े राजनीतिक चेहरे को पुलिस कार्यालय के बाहर बैठना पड़ता है, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। विपक्ष का काम केवल सरकार की आलोचना करना नहीं है। विपक्ष का एक महत्वपूर्ण दायित्व यह भी है कि वह जनता की आवाज को सत्ता और प्रशासन तक मजबूती से पहुंचाए। यदि कोई नागरिक पुलिस कार्रवाई की मांग कर रहा है और उसकी आवाज अनसुनी हो रही है, तो विपक्ष का नेता उसके साथ खड़ा होता है—तो इसे लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि स्वतः पद के दुरुपयोग के रूप में।
हाँ, यह भी उतना ही जरूरी है कि किसी भी जनप्रतिनिधि का पद कानून से ऊपर नहीं हो सकता। पुलिस को भी कानून और प्रक्रिया के अनुसार ही कार्रवाई करनी चाहिए। किसी नेता का दबाव यदि कानून को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल हो, तो वह गंभीर विषय है। लेकिन किसी पीड़ित की शिकायत दर्ज कराने, जांच की मांग करने और प्रशासन से जवाब मांगने को केवल इसलिए गलत नहीं कहा जा सकता कि आवाज उठाने वाला व्यक्ति बड़ा राजनीतिक पद रखता है।
असल परीक्षा तो पुलिस और प्रशासन की निष्पक्षता की है।
एफआईआर दर्ज होना न्याय का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि जांच की शुरुआत है। अब यह सुनिश्चित करना दिल्ली पुलिस की जिम्मेदारी है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, घटना के वास्तविक दोषियों की पहचान हो, पैलेट गन के इस्तेमाल और घायल होने की परिस्थितियों की जांच हो तथा यदि किसी व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
इसके साथ ही घायल साहिल लोचब और उसके परिवार को भी न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा मिलना चाहिए। किसी भी मामले में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर तथ्य सामने आना जरूरी है।
राहुल गांधी ने अपने धरने के बाद एफआईआर दर्ज होने को न्याय की दिशा में पहला कदम बताया। यह बात अपने आप में महत्वपूर्ण है। क्योंकि लोकतंत्र में एफआईआर किसी नेता की जीत नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता के अधिकार की शुरुआत होती है। असली जीत तब होगी जब जांच निष्पक्ष होगी, दोषी सामने आएंगे और पीड़ित को न्याय मिलेगा।
यह घटना एक बड़ा सवाल भी छोड़ती है—अगर राजधानी दिल्ली के बीचों-बीच एक घायल नागरिक को अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए इतना संघर्ष करना पड़े, तो देश के दूरदराज गांवों और छोटे शहरों में आम आदमी की स्थिति क्या होगी?
यही वह सवाल है जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
किसी भी सरकार की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि उसके खिलाफ कितने लोग बोलने से डरते हैं। सरकार की मजबूती इस बात से मापी जाती है कि उसके सामने एक साधारण नागरिक भी बिना भय के अपनी शिकायत रख सके और उसे न्याय मिलने का विश्वास हो।
इसलिए किसी घायल नागरिक के साथ खड़ा होना, उसकी आवाज उठाना और प्रशासन से कार्रवाई की मांग करना—पद का दुरुपयोग नहीं, लोकतांत्रिक जिम्मेदारी का निर्वहन है, बशर्ते यह सब कानून की सीमा में रहकर किया जाए।
राहुल गांधी के धरने को लेकर राजनीतिक बहस हो सकती है, उनके तरीके पर सवाल उठाए जा सकते हैं और उनके आरोपों की स्वतंत्र जांच भी होनी चाहिए। लेकिन एक बुनियादी सिद्धांत पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए—न्याय मांगना किसी नेता का विशेषाधिकार नहीं, हर नागरिक का अधिकार है।
और जब किसी नागरिक की आवाज कमजोर पड़ने लगे, तब लोकतंत्र में जिम्मेदार जनप्रतिनिधि का काम उस आवाज को और मजबूत करना होता है।
अब निगाह एफआईआर से आगे की कार्रवाई पर है। क्योंकि एफआईआर दर्ज होना पहला कदम है, न्याय मिलना मंजिल।


