कैंपा योजना के काम में जेसीबी से खुदाई: जंगल में नियमों की अनदेखी, जिम्मेदार बोले – ‘थोड़ा बहुत तो चलता है

जंगलों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए लागू योजनाओं में ही नियमों की अनदेखी का मामला सामने आया है। नौरोजाबाद वनपरिक्षेत्र के पूर्व चंगेरा बीट में कैंपा योजनांतर्गत मिश्रित वृक्षारोपण कार्य के तहत बनाए जा रहे निरीक्षण मार्ग के निर्माण में जेसीबी मशीन से खुदाई कराई गई है, जबकि वन क्षेत्र में इस तरह के कार्य सामान्यतः मैन्युअल तरीके से कराए जाने का प्रावधान है।


मौके पर ली गई तस्वीरों में साफ दिखाई दे रहा है कि जेसीबी से रास्ते के किनारे गहरी कटिंग कर दी गई, जिससे कई पेड़ों की जड़ें तक उजागर हो गईं और वन भूमि की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कार्य वन विभाग की निगरानी में ही कराया गया।


फेंसिंग के खंभों में जंगल नदी की रेत का उपयोग
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि मिश्रित वृक्षारोपण के लिए लगाए जा रहे तार फेंसिंग के खंभों की फिनिशिंग में जंगल की नदी से निकाली गई रेत का उपयोग किया गया। यदि यह सही पाया जाता है तो यह खनिज नियमों और वन संरक्षण से जुड़े प्रावधानों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।


रेंजर का बदला बयान
मामले में जब नौरोजाबाद रेंज के रेंजर पीयूष तिवारी से बात की गई तो पहले उन्होंने ऐसे किसी कार्य से इनकार किया, लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि “थोड़ा बहुत तो चलता है।” उनके इस बयान ने पूरे मामले में विभागीय जिम्मेदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।


डीएफओ बोले – पहले जानकारी ले लूं
उक्त मामले में जब वनमंडल अधिकारी (DFO) विवेक सिंघ से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि “पहले मैं रेंजर से बात कर लूं, उसके बाद ही बता पाऊंगा कि वहां मशीन से काम कराया गया है या मैन्युअल तरीके से।”


क्या है कैंपा योजना
कैंपा  योजना के तहत जंगलों में वृक्षारोपण, संरक्षण और वन क्षेत्र के विकास के कार्य कराए जाते हैं। इस योजना के तहत कार्यों को पर्यावरण के अनुकूल तरीके से कराने और वन भूमि को कम से कम नुकसान पहुंचाने के स्पष्ट निर्देश होते हैं। ऐसे कार्यों में आमतौर पर मैन्युअल श्रम को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है, ताकि जंगल की प्राकृतिक संरचना और पेड़ों की जड़ों को नुकसान न पहुंचे।


जिम्मेदार ही कर रहे नियमों का उल्लंघन
वन क्षेत्र में भारी मशीनों के उपयोग से मिट्टी की संरचना, पेड़ों की जड़ों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब नियमों का पालन कराने वाले ही उनका उल्लंघन करेंगे तो जंगलों की सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा।