पाली नगर पालिका में ड्राइवर का दबदबा! भाजपा पार्षदों में बगावत के सुर तेज

पाली (उमरिया)- पाली नगर पालिका इन दिनों अजीबोगरीब हालातों से गुजर रही है। नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठे जनप्रतिनिधि से ज्यादा चर्चा उनके ड्राइवर के राज की हो रही है। कहा जा रहा है कि पालिका में बिना ड्राइवर की अनुमति के कोई काम तक नहीं होता। यही वजह है कि अब भाजपा के ही पार्षदों में नाराजगी बढ़ती जा रही है और बगावत के स्वर तेज होने लगे हैं।

ड्राइवर बना ‘सुपर चेयरमैन’

स्थानीय लोगों और कर्मचारियों का कहना है कि पालिका अध्यक्ष का ड्राइवर ही असली फैसले लेता है। छोटे-से-छोटे काम से लेकर बड़े टेंडर तक में उसकी भूमिका मानी जा रही है। अधिकारी भी ड्राइवर के इशारे पर ही फाइल आगे बढ़ाते हैं। यह हाल देखकर कर्मचारियों और आम जनता दोनों में असंतोष है।

भाजपा के पार्षद भी खफा

नगर पालिका अध्यक्ष को पदभार संभाले तीन साल पूरे हो गए हैं। इस बीच भाजपा के कई पार्षदों का कहना है कि उनका कोई सम्मान नहीं बचा है। वे खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि अध्यक्ष की शैली और ड्राइवर की बढ़ती दखलअंदाजी से खफा पार्षद अब खुलकर अपनी नाराजगी जताने लगे हैं।

आने वाले चुनाव पर असर तय

भाजपा के भीतर ही असंतोष के स्वर आने वाले पंचवर्षीय चुनाव में बड़ा सिरदर्द बन सकते हैं। पार्टी के अंदर से ही आवाज उठने लगी है कि यदि यही हाल रहा तो टिकट वापसी तक की नौबत आ सकती है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अध्यक्ष के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष नहीं बल्कि अपनी ही पार्टी के असंतुष्ट नेता और पार्षद होंगे।

लोगों का कहना – ड्राइवर का शासन

शहर के लोग व्यंग्य में कहते हैं कि "पाली में जनप्रतिनिधि नहीं, बल्कि ड्राइवर ही अध्यक्ष है।" यह माहौल भाजपा की छवि को भी नुकसान पहुंचा रहा है। नगर के नागरिकों का कहना है कि जनता ने वोट अध्यक्ष को दिया था, लेकिन हुकूमत ड्राइवर चला रहा है।

भविष्य की राजनीति पर सवाल

नगर पालिका की इन परिस्थितियों ने अध्यक्ष की राजनीतिक जमीन को हिला दिया है। अब यह देखना होगा कि भाजपा इस असंतोष को कैसे संभालती है। लेकिन इतना तय है कि ड्राइवर के एकतरफा राज और पार्षदों की नाराजगी ने आने वाले चुनावी समर में अध्यक्ष की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।