तुलसी महाविद्यालय अनूपपुर में “प्राचार्य खोजो अभियान” — कुर्सी खाली, जिम्मेदारी गायब

अनूपपुर।
शासकीय तुलसी महाविद्यालय, जिसे बड़े गर्व से प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस कहा जाता है, इस समय अपनी जिम्मेदारियों से ज्यादा विवादों के लिए चर्चा में रहता है। जिले का यह प्रमुख शैक्षणिक संस्थान इन दिनों पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा अफसरों की गैरजिम्मेदारी और स्टाफ के दबदबे के लिए सुर्खियों में है।

आज का नज़ारा तो और भी चौंकाने वाला रहा। आरटीआई कार्यकर्ता शिवम पटेल जब यहां सूचना लेने पहुंचे तो उन्हें प्राचार्य डॉ. अनिल कुमार सक्सेना का कमरा खुला तो मिला, लेकिन कुर्सी सूनी थी। जिम्मेदारी का कोई चेहरा मौजूद नहीं था। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब एक सरकारी कॉलेज में जिम्मेदार अधिकारी की कुर्सी खाली रहे तो छात्रों के भविष्य का क्या होगा?

जब उपस्थित शिक्षकों से पूछा गया कि “आज प्रभारी प्राचार्य कौन हैं?” तो किसी के पास जवाब नहीं था। कोई बोला हमें मालूम नहीं, किसी ने बात टाल दी, तो कोई हंसी में उड़ा गया। हिंदी साहित्य विभाग के प्रोफेसर नीरज श्रीवास्तव ने तंज़ कसते हुए कहा – “आज के प्राचार्य तो हमारे लैब टेक्नीशियन संतोष कुमार सिंह हैं।” लेकिन खुद संतोष कुमार सिंह ने भी हंसी के साथ साफ कहा – “भगवान बचाए, मैं प्राचार्य नहीं हूं।”

यही नहीं, वहां मौजूद बाबू तक अनुपस्थित मिले। पूछने पर कर्मचारियों ने स्वीकार किया कि वे भी यह नहीं जानते कि वर्तमान में प्रभारी कौन है। यह दृश्य किसी कॉलेज का नहीं बल्कि प्रशासनिक मजाक का प्रतीक लग रहा था।

सबसे गंभीर बात यह है कि पूरे महाविद्यालय में प्राचार्य डॉ. अनिल कुमार सक्सेना और वनस्पति शास्त्र विभाग की सहायक प्राध्यापक राधा सिंह का इतना दबदबा है कि बाकी स्टाफ और कर्मचारी इनके नाम से सहम जाते हैं। आरटीआई की रिसीविंग देने तक से लोग डर रहे थे। यह हालत बताती है कि कॉलेज शिक्षा का मंदिर कम और “डर का दरबार” ज्यादा बन चुका है।

यह पहला मौका नहीं है जब तुलसी महाविद्यालय सुर्खियों में आया हो। पिछले दिनों भी यह संस्थान अलग-अलग कारणों से विवादों में घिरा रहा है। कभी स्टाफ की मनमानी, कभी छात्रों की शिकायतें, तो कभी प्रशासनिक लापरवाही — हर दिन यहां कोई न कोई नया बवाल देखने को मिल ही जाता है। सवाल यह है कि जब यह कॉलेज आए दिन विवादों का गढ़ बना हुआ है, तो आखिर उच्च शिक्षा विभाग क्यों आंख मूंदकर बैठा है?

छात्रों और अभिभावकों में गुस्सा है कि जब यह कॉलेज प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस की मान्यता प्राप्त है, तो यहां जिम्मेदारी और अनुशासन सबसे ऊँचे स्तर पर होना चाहिए। लेकिन हकीकत इसके उलट है।
आरटीआई आते ही सबकी जुबां हुई बंद,
सवाल सुनते ही अफसर हो गए मंद।
ग़ायब प्राचार्य, दबंग राधा सिंह महान,
छात्र बोले — “किस पर करें अब हम विश्वास का ऐलान?”