ब्रह्मा के मानस-पुत्र हैं देवर्षि नारद, कलह करवाने वाले नहीं बल्कि सभी महर्षियों में श्रेष्ठ हैं नारद

ब्रह्मा के मानस-पुत्र हैं देवर्षि नारद, कलह करवाने वाले नहीं बल्कि सभी महर्षियों में श्रेष्ठ हैं नारद
मनेन्द्रगढ़। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में नारद उनके लिए कहा है कि ऋषियों में मैं नारद हूं। जो वीणापाणि होकर संगीत के साधक हैं और नित्य नारायण के गुणगायक हैं और जो समाचार व सूचनाएं देते हैं और सद्कार्यों व सृजन के लिए प्रेरित भी करते हैं। आश्चर्य कि ऐसे नारद की लोक में छवि कलह कराने वाले की है. उक्त बातें श्री दुर्गा धाम आमाखेरवा रोड में आयोजित संगीतमय बाल्मीकि कथा के अवसर पर कथा व्यास प. विनोदानंद शास्त्री ने कही रामकथा के दूसरे दिन उपस्थित जनसमुदाय को सम्बोधित करते हुये कथा व्यास ने कहा कि भक्ति के प्रसारक, महाज्ञानी, त्रिकालदर्शी देवर्षि नारद की वास्तविक छवि के बारे में शास्त्र कहते हैं कि नारद भगवान का ‘मन’ हैं। इसीलिए भगवान के मन में जो कुछ भी है वह सब नारद को ज्ञात है। सारा इतिहास, ज्ञान और रहस्य, सबकुछ। नार अर्थात् जल और द अर्थात् दाता। वे जल की भांति तरल, सरल, निर्मल, पारदर्शी, तृप्ति व जीवन दायिनी भक्ति के प्रसारक हैं, अतः नारद हैं। अपने आराध्य नारायण की तरह उनके नाम का साम्य भी भगवान और भक्त की संयुक्ति का संकेत कराता है। एक ओर वे संगीत के साधक हैं तो दूसरी ओर नित्य नारायण के गुणगायक। वे एक-दूसरे के समाचार व सूचनाएं भी देते हैं और सद्कार्यों व सृजन के लिए प्रेरित भी करते हैं। दुर्भाग्यवश, लोक में उनकी छवि ‘कलह कराने’ वाले की है लेकिन सच तो यह है कि शास्त्रों में वे सदा ही समन्वय कराते और नकारात्मक को सकारात्मकता की ओर उन्मुख करते मिलते हैं। देवर्षि नारद ऋषि परम्परा के महानतम ऋषि हैं। सम्भवतः वे इकलौते हैं, जिन्हें पुराणों में हर स्थान पर राजर्षि और महर्षि से भी ऊपर देवर्षि का सम्बोधन देकर सम्मानित किया गया है। बहुसंख्य स्थानों पर वे देवर्षि और अनेक स्थानों पर ब्रह्मर्षि कहकर पूजे गए हैं। सृष्टि में उनकी उपस्थिति अनादि है और उनके चरणों का प्रसार ब्रह्मलोक से देवलोक और दानवों के राजमहलों से मृत्युलोक तक है। वेद से पुराण तक, रामायण से महाभारत तक और गीता से स्मृतियों तक नारद हर जगह अपूर्व प्रभाव के साथ उपस्थित हैं। उनकी गरिमा का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि गीता में अर्जुन को अपनी विभूति का परिचय देते हुए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपने को ऋषियों में नारद कहा है। 10वें अध्याय का 26वां श्लोक साक्षी है कि कृ‘अश्वत्थरू सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदरू।’अर्थात्-हे पार्थ! वृक्षों में मैं पीपल हूं और देवर्षियों में नारद हूं। इसी तरह महाभारत के शांतिपर्व के 30वें अध्याय में श्रीकृष्ण के वचन हैं वेद से पुराण तक नारद नारद वेद से पुराण तक वर्णित हैं। अथर्ववेद में नारद नामक ऋषि का नामोल्लेख अनेक बार हुआ है। ऐतरेय ब्राह्मण में वे हरिश्चंद्र के पुरोहित, सोमक साहदेव्य के शिक्षक तथा आम्बष्ठय एवं युधाश्रौष्टि को अभिषिक्त करने वाले के रूप में ऋषि पर्वत के साथ स्मरण किए गए हैं। मैत्रायणी संहिता में नारद एक आचार्य और सामविधानब्राह्मण में बृहस्पति के शिष्य के रूप में वर्णित हैं। छान्दोग्योपनिषद् में ये सनत्कुमार के साथ उल्लिखित हैं। कथा के आज तीसरे दिन कथा व्यास द्वारा ताड़का वध, राजा सगर प्रसंग, भागीरथी तपस्या व गंगा अवतरण की कथा कही जाएगी। श्री दुर्गा धाम समिति के सदस्यों ने क्षेत्र के धर्मानुरागी जनों से आयोजन में सपरिवार शामिल होकर धर्म लाभ उठाने का अनुरोध किया है।