देशभर में एक लाख से अधिक स्कूल बंद: शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी
देशभर में एक लाख से अधिक स्कूल बंद: शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी
— अनीश तिगाला
देशभर में एक लाख से अधिक स्कूलों का बंद होना केवल एक प्रशासनिक निर्णय या आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। शिक्षा किसी भी राष्ट्र की प्रगति की आधारशिला होती है। यदि विद्यालय ही बंद होने लगें, तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ियों के ज्ञान, कौशल और अवसरों पर पड़ना स्वाभाविक है।
ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में स्कूल बंद होने का सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों पर पड़ता है। कई स्थानों पर बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह अतिरिक्त बोझ बन जाता है, जिसके कारण अनेक बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
सरकारें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, संसाधनों के बेहतर उपयोग और विद्यालयों के एकीकरण की बात करती हैं। यदि इन प्रयासों से शिक्षा का स्तर वास्तव में बेहतर होता है तो उनका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि कोई भी नीति लागू करने से पहले उसके सामाजिक प्रभावों का गंभीर मूल्यांकन किया जाए। शिक्षा तक आसान और समान पहुंच किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विद्यालयों को बंद करने के बजाय उन्हें बेहतर शिक्षक, आधुनिक सुविधाएं, डिजिटल संसाधन और मजबूत आधारभूत ढांचा उपलब्ध कराया जाए। शिक्षा में निवेश को खर्च नहीं, बल्कि भविष्य में निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।
देश की प्रगति केवल बड़े शहरों, उद्योगों और आधुनिक तकनीक से नहीं होगी, बल्कि उस बच्चे से होगी जिसे गांव के एक छोटे से विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। यदि स्कूलों के दरवाजे बंद होंगे, तो अनेक बच्चों के सपनों के रास्ते भी संकरे हो जाएंगे।


