संपादकीय: पत्रकारिता और राजनीति—दोहरी भूमिका से निष्पक्षता पर उठते सवाल - अनीश तिगाला

अनूपपुर //लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसका मूल दायित्व सत्ता, विपक्ष और समाज—सभी के प्रति समान दूरी रखते हुए सत्य को सामने लाना है। दूसरी ओर, किसी राजनीतिक दल का मीडिया प्रभारी, सांसद प्रतिनिधि, विधायक प्रतिनिधि या अन्य पदों पर होना उस दल की विचारधारा, नीतियों और कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करना तथा उसकी छवि को मजबूत करना होता है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति एक साथ पत्रकार और किसी राजनीतिक दल का सक्रिय मीडिया प्रभारी या अन्य पद ले लेता है , तब निष्पक्षता को लेकर स्वाभाविक प्रश्न उठना लाज़िमी है।
पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। यदि समाचारों के चयन, प्रस्तुति या विश्लेषण में राजनीतिक निष्ठा का प्रभाव दिखाई देने लगे, तो पाठकों और दर्शकों के मन में यह संदेह पैदा होता है कि खबरें तथ्यों के आधार पर हैं या किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा। यही स्थिति लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करती है।

यह आवश्यक नहीं कि किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हर व्यक्ति निष्पक्ष न हो, लेकिन हितों का टकराव एक वास्तविक चिंता है। इसी कारण दुनिया भर में अनेक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों से अपेक्षा करते हैं कि वे सक्रिय राजनीतिक पदों से दूरी बनाए रखें, ताकि उनकी विश्वसनीयता और स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न न लगे।

दुर्भाग्य से आज मीडिया का एक वर्ग अक्सर किसी न किसी राजनीतिक धड़े के पक्ष या विपक्ष में खड़ा दिखाई देता है। ऐसी प्रवृत्ति को लेकर समय-समय पर "गोदी मीडिया" जैसे शब्द भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने हैं। 

पत्रकारिता का चोला पहनकर राजनीतिक भूमिका निभाना या राजनीतिक भूमिका निभाते हुए स्वयं को पूर्णतः स्वतंत्र पत्रकार के रूप में प्रस्तुत करना—दोनों ही स्थितियाँ पारदर्शिता के सिद्धांत के विपरीत मानी जा सकती हैं। यदि कोई व्यक्ति सक्रिय राजनीति में है, तो उसकी भूमिका स्पष्ट रूप से सार्वजनिक होनी चाहिए। इसी प्रकार यदि कोई पत्रकार है, तो उसकी प्राथमिक निष्ठा केवल सत्य, तथ्य और जनहित के प्रति होनी चाहिए।

लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है कि पत्रकारिता स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह बनी रहे। राजनीतिक दलों को भी अपने प्रचार के लिए मीडिया प्रभारियों की भूमिका स्पष्ट रखनी चाहिए और पत्रकारिता को अपनी स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। जनता को निष्पक्ष सूचना मिलना ही स्वस्थ लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है।