पाली में प्रधानमंत्री पोषण योजना की कुकिंग प्रतियोगिता बनी खानापूर्ति! घरों से बनाकर लाए गए व्यंजन, आदेशों और मानकों पर उठे सवाल,,रिपोर्ट@राजकुमार गौतम उमरिया

पाली (उमरिया)। प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना के अंतर्गत कुक कम हेल्पर्स की रचनात्मकता, स्वच्छता, गुणवत्ता और पौष्टिक भोजन तैयार करने की क्षमता को परखने के उद्देश्य से आयोजित की जाने वाली कुकिंग प्रतियोगिता पाली जनपद में महज औपचारिकता बनकर रह गई। जिला पंचायत उमरिया द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और निर्धारित मानकों की अनदेखी करते हुए आयोजित इस कार्यक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

जिला पंचायत उमरिया के मुख्य कार्यपालन अधिकारी अभय सिंह ओहरिया द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि प्रतियोगिता का आयोजन 18 जून 2026 तक अनिवार्य रूप से संपन्न कराया जाए। साथ ही प्रत्येक विकासखंड में चयन समिति गठित कर मौके पर तैयार किए गए व्यंजनों का मूल्यांकन करते हुए विजेताओं का चयन किया जाना था। लेकिन पाली जनपद में प्रतियोगिता निर्धारित तिथि से दो दिन बाद 20 जून को आयोजित की गई और चयन समिति के सभी निर्धारित सदस्य भी उपस्थित नहीं थे।

सबसे बड़ा सवाल प्रतियोगिता की मूल अवधारणा को लेकर खड़ा हो गया है। दरअसल, इस प्रतियोगिता का उद्देश्य यह था कि रसोइयों द्वारा आयोजन स्थल पर ही भोजन तैयार किया जाए, जिससे यह देखा जा सके कि खाना बनाते समय स्वच्छता, गुणवत्ता, पोषण स्तर और स्वाद का कितना ध्यान रखा जा रहा है। तभी सही मायनों में प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार के पात्र प्रतिभागियों का निष्पक्ष चयन संभव हो पाता।

लेकिन पाली में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई दी। कार्यक्रम में शामिल अधिकांश रसोइयों द्वारा अपने-अपने घरों से ही व्यंजन तैयार कर लाए गए। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर प्रतियोगिता का औचित्य क्या रह जाता है? जब भोजन आयोजन स्थल पर तैयार ही नहीं हुआ, तो यह कैसे तय किया गया कि किस प्रतिभागी ने स्वच्छता, गुणवत्ता और निर्धारित मानकों का बेहतर पालन किया।

प्रतियोगिता में शामिल रसोइयों से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि उन्हें घर से ही व्यंजन तैयार कर लाने के निर्देश दिए गए थे। उनका कहना था कि सभी प्रतिभागी अपने घरों में भोजन बनाकर कार्यक्रम स्थल पर लेकर पहुंचे थे।

वहीं, इस संबंध में जब जनपद पंचायत पाली के मुख्य कार्यपालन अधिकारी कुंवर कन्हाई से जानकारी ली गई तो उन्होंने कहा कि आयोजन स्थल पर पर्याप्त संख्या में चूल्हों की व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी, इसलिए प्रतिभागियों को अपने-अपने विद्यालयों से भोजन बनाकर लाने के लिए कहा गया था। उन्होंने यह भी कहा कि इस बात की पुष्टि संकुल शिक्षकों द्वारा की जा सकती है।

हालांकि जब उन्हें यह बताया गया कि प्रतियोगिता में शामिल कई रसोइयों ने विद्यालय के बजाय अपने घरों से ही भोजन तैयार कर लाने की बात कही है, तो इस पर वे असहज दिखाई दिए। चर्चा के दौरान उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि मीडिया द्वारा अनावश्यक रूप से बयान लिए गए हैं।

इधर, जिला पंचायत के आदेश में प्रत्येक विकासखंड से कम से कम 30 कुक कम हेल्पर्स की भागीदारी सुनिश्चित करने तथा ऐसे ग्रामीण समुदाय की महिलाओं को भी आमंत्रित करने का स्पष्ट उल्लेख किया गया था, जिनके बच्चे शासकीय विद्यालयों में अध्ययनरत हों। लेकिन सूत्रों के अनुसार न तो निर्धारित संख्या में रसोइयों की सहभागिता सुनिश्चित की गई और न ही ग्रामीण समुदाय की महिलाओं की भागीदारी दिखाई दी।

ऐसे में सवाल यह उठना लाजिमी है कि जब प्रतियोगिता निर्धारित तिथि से विलंब से आयोजित हुई, चयन समिति पूर्ण नहीं थी, प्रतिभागियों की संख्या निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं रही और भोजन भी आयोजन स्थल के बजाय घरों से बनाकर लाया गया, तो क्या वास्तव में प्रधानमंत्री की इस महत्वाकांक्षी योजना के उद्देश्यों की पूर्ति हुई या फिर पूरा आयोजन केवल औपचारिकता निभाने तक सीमित रह गया?