पाली वनपरिक्षेत्र में,लकड़ी सिंडिकेट, का खेल? रामपुर डिपो से उठी खेप, सीधे आरा मशीन पहुँची — नियम ताक पर!

उमरिया जिले के पाली वनपरिक्षेत्र में इन दिनों लकड़ी के काले खेल की गूंज तेज हो गई है। रामपुर डिपो से कथित तौर पर भारी मात्रा में लकड़ी की निकासी कर वाहन क्रमांक MP-66-G-2208 के जरिए सीधे अग्रवाल सा मिल तक पहुँचाने का मामला सामने आया है। अब सवाल यह है कि आखिर किसके इशारे पर यह पूरा खेल बेखौफ चल रहा है?
वन विभाग के सख्त नियमों की मानें तो डिपो से लकड़ी की बिक्री और परिवहन कोई मामूली प्रक्रिया नहीं है। हर एक लकड़ी का रिकॉर्ड, नीलामी प्रक्रिया, परिवहन चालान (ट्रांजिट पास – TP) और अधिकृत खरीदार की पूरी जानकारी अनिवार्य होती है। बिना वैध परमिट के एक गट्ठर लकड़ी तक बाहर नहीं जा सकती — लेकिन यहाँ तो क्विंटल के हिसाब से खेप निकल गई!


सूत्र बताते हैं कि नियमों को दरकिनार कर सीधे डिपो से लकड़ी उठाकर निजी आरा मशीन तक पहुंचाई गई। अगर यह सच है, तो यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि संगठित मिलीभगत की बू देता है। क्योंकि बिना उच्च अधिकारियों की जानकारी या संरक्षण के ऐसा संभव ही नहीं माना जाता।


*इस पूरे मामले पर जब एसडीओ दिगेन्द्र पटेल से बात की गई, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि*
*“बिना नीलामी प्रक्रिया किसी को लकड़ी दिया जाना गलत है। मैं इस पूरे मामले की जांच करवा लेता हूं, जो भी तथ्य सामने आएंगे उस पर यथाउचित कार्रवाई की जाएगी।”*
 *वहीं जिला काष्ठगार प्रभारी धीरेंद्र सिंह से चर्चा में उन्होंने भी साफ कहा कि*


*“बिना नीलामी प्रक्रिया किसी को इस प्रकार से लकड़ी देना अवैध है। हमारे यहां से कोई नीलामी नहीं हुई है और न ही पाली डिपो के लिए किसी प्रकार का कोई ट्रांजिट पास (TP) जारी किया गया है।”*
इन दोनों जिम्मेदार अधिकारियों के बयानों ने पूरे मामले को और भी गंभीर बना दिया है, क्योंकि एक तरफ डिपो से लकड़ी निकलने की बात सामने आ रही है और दूसरी तरफ विभागीय रिकॉर्ड में न तो नीलामी है और न ही परिवहन अनुमति!
नियम क्या कहते हैं? 
सरकारी डिपो की लकड़ी आमतौर पर नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से ही बेची जाती है।
खरीदार का पंजीकरण और वैध दस्तावेज़ अनिवार्य होता है।
लकड़ी के परिवहन के लिए ट्रांजिट पास (TP) जरूरी होता है।
हर खेप का पूरा रिकॉर्ड विभाग के पास सुरक्षित रहता है।
ऐसे में यदि बिना स्पष्ट प्रक्रिया के लकड़ी सीधे आरा मिल तक पहुंचाई गई है, तो यह न सिर्फ विभागीय लापरवाही बल्कि संभावित भ्रष्टाचार का बड़ा मामला बन सकता है।
अब बड़ा सवाल:
क्या यह सब अधिकारियों की मिलीभगत से हो रहा है?
या फिर जिम्मेदार जानबूझकर आंख मूंदे बैठे हैं?
यदि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होती है, तो “लकड़ी के इस खेल” में शामिल कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं। फिलहाल पाली वनपरिक्षेत्र में यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं।