अमरकंटक में बुंदेलखंड की लोक-परंपरा का दीपावली पर दिव्य उत्सव,मौन व्रत,लोक नृत्य व वादन के साथ पटैल-कछवाहा समाज का अध्यात्ममय आयोजन ,,संवाददाता - श्रवण उपाध्याय 

अमरकंटक - मां नर्मदा की उद्गम स्थली / पवित्र नगरी अमरकंटक में बुधवार 22 अक्टूबर 2025 को धर्म , संस्कृति और परंपरा के त्रिवेणी संगम पर जब श्रद्धा की दीपशिखा प्रज्वलित होती है , तब ऐसा दृश्य साक्षात दिव्यता का आभास कराता है । ऐसी ही एक अनुपम झांकी दीपावली के पावन अवसर पर अमरकंटक की पुण्यभूमि पर देखने को मिली , जब सागर जिले के कनैय खेड़ा ग्राम से पधारे पटैल–कछवाहा समाज के 45 श्रद्धालुजन लोक परंपरा का अनुपम उत्सव लेकर यहाँ पहुँचे ।

दीपावली के दूसरे दिवस , कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को बुंदेलखंड अंचल में 'गौ-पूजन एवं मौन व्रत यात्रा' की परंपरा सजीव होती है । इस दिन समाज के सदस्य गौ माता के चरणों में लोटते हुए , मौन व्रत धारण कर , पवित्र वेशभूषा में 12 किलोमीटर की धार्मिक पदयात्रा पूर्ण करते हैं ।

श्वेत वस्त्रों—धोती , परद्नी व बनियानी—में सुसज्जित , मुंह पर दूर्वा धारण किए ये श्रद्धालुजन पूरे मार्ग में ढोलक , मंजीरा , टिमकी , बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मधुर स्वर-लहरियों के साथ झूम-झूमकर नृत्य करते हैं । लोक-गीतों के स्वरों में भक्ति , उल्लास व परंपरा का गान गुंजायमान होता है ।

इस दिव्य अवसर पर अमरकंटक के नर्मदा मंदिर परिसर तथा नगर के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर समाज द्वारा उत्सव मनाया गया , जो न केवल श्रद्धा का प्रदर्शन था बल्कि बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज भी बन गया ।

पर्यटक व तीर्थयात्री भी इस लोकमंगल यात्रा के साक्षी बने । कई श्रद्धालु नर्तक दल के साथ थिरकते हुए इस अनुपम उत्सव का आनंद लेते देखे गए । श्रद्धा , भक्ति और उल्लास का ऐसा संगम अमरकंटक की पावन वायु में दिव्यता भर गया ।

अमरकंटक क्षेत्र में ऐसी मान्यता है कि गोवर्धन पूजन के दिन गौ माता के नीचे से निकलने से समस्त पाप कटते हैं व पुण्य की प्राप्ति होती है । गोवर्धन पूजन भी क्षेत्र के लोग खूब मनाते है ।  गौ पूजन कर मौन व्रत रख जंगल की ओर गाय , बछड़ा लेकर जाते है और शाम को वापस घर लाते है । इस पूरे समय मौन व्रत रखा जाता है । गौ पूजन कर मौन व्रत , उपवास पूर्ण करते है । 

साधक अपने भीतर की आत्मशक्ति को जागृत कर लोककल्याण की भावना से ओतप्रोत होता है ।
बुंदेलखंड की यह परंपरा आज भी संस्कार , संस्कृति व समाज की एकता का दिग्दर्शक बनी हुई है , जिसे पटैल-कछवाहा समाज हर वर्ष श्रद्धा व भक्ति के साथ आगे बढ़ा रहा है ।
 
"धर्म, संस्कृति और परंपरा जब संग चलें , तब लोक जीवन दिव्य पर्व बन जाता है।"