श्रीयंत्र महामेरु मंदिर के प्रणेता अटल पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्मलीन श्री 1008 स्वामी शुकदेवानंद जी महाराज की सातवीं पुण्यतिथि श्रावण शुक्ल सप्तमी को आश्रम में मनाई जायेगी ,,संवाददाता - श्रवण कुमार उपाध्याय
श्रीयंत्र महामेरु मंदिर के प्रणेता अटल पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्मलीन श्री 1008 स्वामी शुकदेवानंद जी महाराज की सातवीं पुण्यतिथि श्रावण शुक्ल सप्तमी को आश्रम में मनाई जायेगी ,,संवाददाता - श्रवण कुमार उपाध्याय
अमरकंटक - मां नर्मदा जी की उद्गम स्थली/पवित्र नगरी अमरकंटक में स्थित श्रीयंत्र महामेरु मंदिर और आश्रम के प्रणेता परम पूज्य अटल पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्मलीन श्री 1008 स्वामी शुकदेवानंदपुरी जी महाराज का 16 अगस्त 2018 में अपने सभी भक्तजनों , शिष्यों और प्रेमीजनों को छोड़कर मां नर्मदा जी के चरणों में लीन हो गए ।
आज 31 जुलाई दिन गुरुवार श्रावण शुक्ल सप्तमी तिथि को श्रीयंत्र महामेरु मंदिर,आश्रम प्रांगण में आश्रम के अध्यक्ष श्री 108 स्वामी शरदपुरी जी महाराज के सानिध्य में ब्रह्मलीन स्वामी शुकदेवानंद जी की सातवीं पुण्यतिथि मनाई जाएगी ।
श्रीयंत्र मंदिर के प्रणेता अटल अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर ब्रह्मलीन स्वामी शुकदेवानंद जी महाराज ने श्रीयंत्र मंदिर बनाने की सोच उनके दिमाग की उपज है । यह श्रीयंत्र मंदिर वास्तव में श्रीयंत्र महामेरु शक्ति पीठ है । इस मंदिर का निर्माणाधीन कार्य 1991 से प्रारंभ है । इस मंदिर को भारतीय प्राच्य योग शोध संस्थान के तत्वाधान में बनाया जा रहा था । स्वामी जी इस श्रीयंत्र मंदिर निर्माण के पीछे एक प्रेरक शक्ति थे जो यह पूरा होने पर पूरी दुनिया में एक तरह का एकमात्र मंदिर होगा । स्वामी जी ने अपने स्वप्निल प्रोजेक्ट को पूर्ण हुए देखे बिना ही मोक्षधाम चल बसे । उसके बाद यह कार्यभार उत्तराधिकारी स्वामी शरद पुरी जी महाराज को सौंपा गया जो पूरा मंदिर आश्रम वर्तमान में सम्हाल रहे है ।
श्रीयंत्र मंदिर का निर्माणकार्य लगभग 30 वर्ष से अधिक हो चुका है । मंदिर निर्माण देरी की मुख्य वजह रुका कार्य पुनः प्रारंभ के लिए गुरु पुष्य नक्षत्र का मुहूर्त आने पर किया जाता है जो यह नक्षत्र वर्ष में औसतन 4या5 दिन ही पड़ते है । उनके प्रिय शिष्य अमरकंटक निवासी नर्मदा मंदिर पुजारी कामता प्रसाद द्विवेदी ने बताया कि स्वामी जी ने अपने जीवन का अधिकतर घोर साधना नर्मदा के उद्गम स्थल समीप ही किया था । साधना पूर्ण होने पर अमरकंटक में ही आश्रम का निर्माण और श्रीयंत्र महामेरु मंदिर की स्थापना प्रारंभ किये थे ।


