संजय गांधी ताप विद्युत केंद्र में ‘उपलब्धि’ बनाम ‘उलझे सवाल,रोटर मरम्मत के दावे से लेकर कोल हैंडलिंग टेंडर, तक प्रबंधन पर कई गंभीर प्रश्न,,रिपोर्ट@राजकुमार गौतम उमारिया
संजय गांधी ताप विद्युत केंद्र में ‘उपलब्धि’ बनाम ‘उलझे सवाल,रोटर मरम्मत के दावे से लेकर कोल हैंडलिंग टेंडर, तक प्रबंधन पर कई गंभीर प्रश्न

उमरिया। निरीक्षण के दौरान संजय गांधी ताप विद्युत केंद्र में प्रबंधन और मीडिया के बीच हुई तीखी बहस ने तकनीकी उपलब्धियों के दावों के साथ-साथ वित्तीय पारदर्शिता और टेंडर प्रक्रिया पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

प्रबंध निदेशक (एमडी) मंजीत सिंह ने 500 मेगावाट यूनिट में रोटर डैमेज के बावजूद 100 दिन तक सफल संचालन को “राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धि” बताया। उनके अनुसार, विशेषज्ञों ने यूनिट के लंबे समय तक बंद रहने की आशंका जताई थी, लेकिन स्थानीय इंजीनियरों और कर्मचारियों ने सीमित संसाधनों में मरम्मत कर इसे निरंतर संचालित किया।

हालांकि, इस तकनीकी उपलब्धि के दावे के बीच कई प्रशासनिक और वित्तीय मुद्दों ने बहस को नया मोड़ दे दिया।
वैगन पलटने और ट्रांजिट लॉस पर सवाल
पिछले महीने हर्री टोला (अंबिकापुर मार्ग) के पास वैगन पलटने और अनलोडिंग के बाद वैगनों में कोयला शेष पाए जाने का मामला भी चर्चा में रहा। इस पर एमडी ने कहा कि अनलोडिंग के दौरान थोड़ा-बहुत कोयला चिपका रह जाना सामान्य प्रक्रिया है और इसे बड़ा नुकसान बताना उचित नहीं।

उन्होंने 0.8 प्रतिशत तक ट्रांजिट लॉस को नियमों के तहत अनुमन्य बताते हुए कहा कि किसी भी प्रकार की क्षति की वसूली संबंधित पक्ष से की जाती है।
इसके बावजूद जांच रिपोर्ट सार्वजनिक न होने से पारदर्शिता को लेकर सवाल बने हुए हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि सब कुछ नियमसम्मत है तो जांच विवरण सार्वजनिक करने में संकोच क्यों?
चचाई बनाम पाली: अनलोडिंग दरों का अंतर
कोयला अनलोडिंग की दरों में भारी अंतर भी बहस का विषय बना हुआ है। आरोप है कि चचाई में जहां लगभग ₹6.50 प्रति मीट्रिक टन भुगतान किया जाता है, वहीं यहां ₹37 प्रति टन की दर स्वीकृत है।
एमडी ने इस पर सीधे जवाब देने के बजाय दोनों स्थानों के कार्य-क्षेत्र (स्कोप) और परिस्थितियों की तुलना करने की बात कही।
सूत्रों के अनुसार, ₹37 की दर मूलतः मैनुअल अनलोडिंग के लिए स्वीकृत की गई थी, जबकि वर्तमान में हॉपर (बॉटम-डिस्चार्ज) वैगनों से अनलोडिंग हो रही है। ऐसे में लागत और भुगतान संरचना की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठ रहे हैं। आलोचकों का दावा है कि इससे श्रमिकों का रोजगार प्रभावित हुआ है और निजी ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने की आशंका भी व्यक्त की जा रही है।
कोल हैंडलिंग टेंडर पर भी उठे प्रश्न
मामला यहीं नहीं थमता। वर्ष 2024 में कोल हैंडलिंग प्लांट के लिए जारी टेंडर में स्पष्ट उल्लेख था कि ठेका किसी भी स्थिति में सब-लेट नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद ठेका कंपनी द्वारा कार्य किसी अन्य कंपनी को सौंपे जाने की चर्चा है।
यदि ऐसा हुआ है तो सवाल यह है कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के निर्णय के विपरीत यह अनुमति किस स्तर से दी गई?
इसी टेंडर में लगभग 37 लाख मीट्रिक टन कोयला लाने वाली एन-बॉक्स और बीओबीआरएन वैगनों की रैक को नए और पुराने ट्रैक हॉपर पर खाली कराने की शर्त भी शामिल बताई जाती है। सूत्रों का दावा है कि वर्क ऑर्डर जारी करते समय इस महत्वपूर्ण शर्त को हटा दिया गया। यदि यह तथ्य सही है तो क्या इससे ठेका कंपनी को प्रत्यक्ष लाभ नहीं पहुंचाया गया?
साथ ही यह प्रश्न भी उठ रहा है कि यदि ‘ठेका सब-लेट’ करने की शर्त का उल्लंघन हुआ है तो क्या अनुबंध निरस्तीकरण और 24 प्रतिशत तक की पेनाल्टी जैसी कार्रवाई की जाएगी?
उपलब्धि बनाम जवाबदेही
पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या तकनीकी उपलब्धियों के दावों के साथ वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही भी समान रूप से सुनिश्चित की जा रही है?
निरीक्षण के दौरान दिए गए जवाबों ने जहां उपलब्धि की कहानी को प्रमुखता दी, वहीं उठे प्रश्नों पर स्पष्टता का अभाव चर्चा का विषय बना हुआ है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जांच रिपोर्टें सार्वजनिक होंगी, टेंडर शर्तों पर स्थिति स्पष्ट की जाएगी और अनलोडिंग दरों के अंतर पर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आएगा—या फिर मामला फाइलों में ही सीमित रह जाएगा।


