संपादकीय: जंतर-मंतर की गूंज और मीडिया पर उठते सवाल — आखिर भरोसा क्यों घट रहा है?
संपादकीय: जंतर-मंतर की गूंज और मीडिया पर उठते सवाल — आखिर भरोसा क्यों घट रहा है?
अनूपपुर / दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र-युवा आंदोलनों के दौरान एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। कुछ मुख्यधारा (मेन स्ट्रीम) मीडिया चैनलों के पत्रकारों को प्रदर्शनकारियों के विरोध, नारेबाजी और सवालों का सामना करना पड़ा। यह केवल किसी एक घटना का मामला नहीं है, बल्कि उस बदलते सामाजिक माहौल का संकेत है, जिसमें मीडिया के प्रति जनता का विश्वास लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। उसकी जिम्मेदारी सत्ता से सवाल पूछना, समाज की आवाज़ को सामने लाना और तथ्यों पर आधारित निष्पक्ष जानकारी जनता तक पहुंचाना है। ऐसे में यदि किसी वर्ग के लोगों के मन में मीडिया की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा हो रहा है, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए गंभीर विचार का विषय है।
हालांकि, किसी भी पत्रकार के साथ अभद्र व्यवहार, धमकी या हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता। असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन उसका स्वरूप शांतिपूर्ण और संवैधानिक होना चाहिए। दूसरी ओर, मीडिया संस्थानों के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है कि क्या उनकी रिपोर्टिंग को लेकर उठ रहे सवालों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। क्या समाज के सभी पक्षों को समान अवसर और स्थान मिल रहा है? क्या जनता की अपेक्षाओं और पत्रकारिता के मूल्यों के बीच बढ़ती दूरी को कम करने के प्रयास हो रहे हैं?
सोशल मीडिया के दौर में हर नागरिक के हाथ में एक कैमरा और एक मंच है। अब समाचारों की तुलना, तथ्य-जांच और वैकल्पिक दृष्टिकोण पहले से कहीं अधिक आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे समय में मीडिया की विश्वसनीयता केवल उसके प्रभाव से नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता, पारदर्शिता और तथ्यपरकता से तय होगी।
जंतर-मंतर की घटनाएं केवल विरोध प्रदर्शन की कहानी नहीं हैं; वे मीडिया और समाज के बीच बदलते रिश्ते की भी कहानी कहती हैं। यदि जनता का भरोसा कमजोर पड़ता है, तो उसका असर लोकतंत्र की संस्थाओं पर भी पड़ता है। इसलिए यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संवाद का है।
— वरिष्ठ पत्रकार मनोज शुक्ला


