संपादकीय: बरी होने के बाद न्याय कौन लौटाएगा?

*अनीश तिगाला*

खरगोन हिंसा मामले में 11 आरोपियों को अदालत द्वारा बरी किए जाने का फैसला केवल एक आपराधिक मुकदमे का अंत नहीं है, बल्कि हमारी न्याय व्यवस्था के सामने कई गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों ने वर्षों तक मुकदमे, जेल और सामाजिक बदनामी का बोझ उठाया, उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
2022 में हुई हिंसा के बाद प्रशासन ने बुलडोजर कार्रवाई की थी। उस समय तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने भी सख्त कार्रवाई का समर्थन किया था। लेकिन यदि बाद में अदालत आरोप सिद्ध न होने के आधार पर लोगों को बरी कर देती है, तो यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जिन परिवारों के घर टूटे, जिनकी आजीविका प्रभावित हुई और जिनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को आघात पहुँचा, उन्हें न्याय कैसे मिलेगा?
कानून का मूल सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति को दोषी तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक अदालत उसे दोषी सिद्ध न कर दे। यदि दंडात्मक या विध्वंसात्मक कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले हो जाती है और बाद में अदालत पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण आरोपियों को बरी कर देती है, तो यह व्यवस्था की जवाबदेही पर बहस को जन्म देता है।
यह मुद्दा किसी धर्म, जाति या राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि संविधान, विधि के शासन और नागरिक अधिकारों का है। यदि राज्य की कार्रवाई गलत साबित होती है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह भी चर्चा का विषय होना चाहिए कि प्रभावित नागरिकों के अधिकारों की बहाली और संभावित क्षतिपूर्ति के लिए क्या व्यवस्था होनी चाहिए।
न्याय केवल अदालत के फैसले तक सीमित नहीं होना चाहिए। न्याय का अर्थ यह भी है कि यदि किसी निर्दोष व्यक्ति ने व्यवस्था की गलती का खामियाजा भुगता है, तो उसकी प्रतिष्ठा, अधिकार और जीवन को यथासंभव पुनर्स्थापित करने का प्रयास हो। यही कानून के शासन और लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी है।