तमंचा है..हां ! चलता है...हां ! तब तो ठीक है ?
-राजकमल पांडे
इन दिनों भारतीय राजनीति में एक विषय शेष रह गया है, और वो है हास्या का विषय। कविराज ! कहते हैं कि सब एक दिन सुधर जाएँगे। फिर वही पाईजी ! अपने राजनीतिक रिपोर्ट में कहते हैं कि कुछ नही सुधरेगा। सब ज्यों का त्यों है। आप जानते नही क्या तमंचा कितना घातक हथियार है, बावजूद इसके लोग रखते हैं। और हम तो कहते हैं कि मतदाताओं को रुपए के बदले  तमंचा बाँटा जाए ताकि वह भी एक आध पतंगे मार गिराएँ। और भारतीय राजनीति में तमंचा इसलिए भी जरूरी है कि मतदाता सहमे रहें, कार्यकर्ता दुबके और जनजीवन के व्यवस्थाधीश नाचते रहें। इसलिए कविराज ने पूछा क्या तमंचा है, तो नेता जी ने कहा हाँ है..! चलता है ! हाँ चलता है...! तब तो ठीक है ? नेता जी भली भाँति जानते हैं कि तमंचा क्या है, क्या प्रशासन नही जानता कि तमंचा क्या है। और अगर नही जानते हैं तो तमंचा का लाइसेंस के विषय में जान लेने मात्र से आचार संहिता का प्रमुखता से पालन किया जा सकता है। पाईजी ! बारम्बार पूछते हैं कि भारतीय राजनीति में किन किन नेताओं के पास तमंचा है। वह अभी पूछ ही रहे हैं कि और पूछते रहेंगे। क्या तमंचा है ? इस पर नेताओं को जबाब देना होगा।