सांसद जी! पेट्रोल नहीं, पहले भाषा की शुद्धता जांचिए
सांसद जी! पेट्रोल नहीं, पहले भाषा की शुद्धता जांचिए
जनता पेट्रोल भरवाए या नेताओं के बोलने का बिल चुकाए?
पेट्रोल की कीमत जेब में आग लगा रही है और ऊपर से अगर कोई जनप्रतिनिधि जनता से ही पूछ बैठे—“शुद्ध पेट्रोल क्या तुम्हारे बाप के घर से आएगा?”—तो सवाल सिर्फ पेट्रोल की शुद्धता का नहीं रह जाता, सवाल जनप्रतिनिधियों की भाषा और जनता के सम्मान का भी बन जाता है।
मध्य प्रदेश के रीवा संसदीय क्षेत्र से सांसद जनार्दन मिश्रा के नाम से सामने आए इस कथित बयान ने सियासी गलियारों से लेकर आम लोगों तक बहस छेड़ दी है। आखिर जनता अगर पेट्रोल की गुणवत्ता पर सवाल पूछती है, तो जवाब में उसे तंज क्यों सुनना पड़े?
जनता पेट्रोल मुफ्त में नहीं मांग रही। वह अपनी मेहनत की कमाई से पेट्रोल खरीदती है। टैक्स देती है, महंगाई सहती है और फिर उम्मीद करती है कि उसे मिलावट रहित और मानक के अनुरूप ईंधन मिले। ऐसे में सवाल पूछना जनता का अधिकार है, कोई अपराध नहीं।
सांसद जी, सवाल जनता का है, जवाब भी जनता को चाहिए
लोकतंत्र में सांसद जनता के मालिक नहीं, जनता के प्रतिनिधि होते हैं। जनता ने उन्हें संसद तक इसलिए भेजा है कि वे जनता की आवाज उठाएं, न कि जनता के सवालों को ही कटघरे में खड़ा कर दें।
अगर पेट्रोल शुद्ध है तो प्रमाण के साथ बताइए। अगर मिलावट नहीं है तो जांच कीजिए। अगर व्यवस्था में कोई खामी है तो उसे दूर कराइए। लेकिन सवाल पूछने वाले नागरिक को यह कहना कि “तुम्हारे बाप के घर से आएगा?”—यह जवाब नहीं, बल्कि सवाल से बचने का रास्ता नजर आता है।
पेट्रोल में मिलावट का सवाल हो या भाषा में मर्यादा की कमी?
आज आम आदमी पेट्रोल-डीजल की कीमत, टैक्स, महंगाई और रोजमर्रा के खर्च से परेशान है। दोपहिया वाहन में पेट्रोल भरवाने से पहले जेब देखनी पड़ती है। ऐसे समय में जब कोई नागरिक पेट्रोल की गुणवत्ता को लेकर सवाल करता है, तो उसे आश्वासन चाहिए, व्यंग्य नहीं।
सियासत में बड़े बोल शायद तालियां बटोर लें, लेकिन जनता के मन में सम्मान नहीं पैदा करते।
जनता के बाप का घर कौन-सा है?
व्यंग्य की भाषा में कहें तो सांसद जी, जनता के बाप का घर आखिर है कहां?
वही घर जहां से टैक्स जाता है?
वही घर जहां से वोट निकलता है?
वही घर जहां से सरकार चलाने के लिए पैसा आता है?
अगर हां, तो फिर जनता को यह अधिकार तो दीजिए कि वह पूछ सके—हमारे पैसे से खरीदे जा रहे पेट्रोल की गुणवत्ता क्या है?
जनता को न किसी के घर से पेट्रोल चाहिए और न किसी पर एहसान। उसे चाहिए सिर्फ अपने पैसे का पूरा मूल्य और अपने सवाल का सम्मानजनक जवाब।
लोकतंत्र में कुर्सी बड़ी नहीं, जनता बड़ी होती है
सांसद की कुर्सी पांच साल की होती है, लेकिन जनता स्थायी होती है। आज जो सवाल एक नागरिक पूछ रहा है, कल वही सवाल हजारों-लाखों लोग पूछ सकते हैं।
इसलिए जनप्रतिनिधियों के लिए जरूरी है कि वे जनता के सवालों से नाराज होने के बजाय उन्हें गंभीरता से लें।
पेट्रोल शुद्ध है तो जांच की रिपोर्ट सामने रखिए।पेट्रोल महंगा है तो कारण बताइए।और जनता सवाल पूछ रही है तो जवाब दीजिए।


