स्वच्छता के नाम पर भ्रष्टाचार: पाली नगर पालिका में फिनायल खरीद घोटाला उजागर,,रिपोर्ट@राजकुमार गौतम उमरिया
स्वच्छता के नाम पर भ्रष्टाचार: पाली नगर पालिका में फिनायल खरीद घोटाला उजागर

पाली। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा चलाए गए ‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत’ अभियान की बड़ी मुहिम में जनता से उम्मीद थी कि नगर की सफाई व्यवस्था में सुधार होगा। लेकिन उमरिया जिले के नगर पालिका परिषद पाली में हालात बताते हैं कि यहां स्वच्छता के नाम पर कमाई और मुनाफा प्राथमिकता बन गया है, और जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।
मामला सामने आया है कि नगर पालिका ने लगभग 7 लाख रुपये खर्च कर फिनायल खरीदा, लेकिन ट्रेंचिंग ग्राउंड में रखे ड्रमों की वास्तविक स्थिति ने इस खरीद की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ड्रमों पर हल्की-सी मुहर “Phenyle” दिखाई देती है, लेकिन मोटे अक्षरों में “LIQUID GLUCOSE” लिखा होने से साफ लगता है कि सामान या तो गलत पैकिंग में आया है, या उसकी गुणवत्ता मानक के अनुरूप नहीं है।
स्थानीय कर्मचारियों ने बताया कि बैरल पर बैच नंबर हाथ से लिखा गया है, निर्माण तिथि, एक्सपायरी, और ग्रॉस वेट सभी में ‘NA’ अंकित है। साथ ही MSDS/ISI का कोई उल्लेख नहीं है, जो यह इंगित करता है कि सामग्री की मूल सुरक्षा और मानक जांच पूरी नहीं हुई है।
हमने जब उक्त स्थान पर जाकर इस फिनायल को देखा, तो यह बेहद पतला और न तो किसी खुशबू वाला था और न ही बदबूदार, जो स्पष्ट रूप से बताता है कि यह सामान्य मानक फिनायल की तरह नहीं है। जबकि ओरिजिनल फिनायल में एक हल्की खुशबू होती है, घना रंग और साफ रासायनिक गुण होते हैं, जो इसे सही और मानक फिनायल बनाते हैं। इस तुलना से स्पष्ट होता है कि नगर पालिका द्वारा खरीदा गया फिनायल गुणवत्ता और मानक दोनों में ही संदिग्ध है।
इस संबंध में स्टोर प्रभारी पुरुषोत्तम प्रजापति ने कहा,
“जब यह फिनायल आया, मैं छुट्टी पर था। इसकी गुणवत्ता की जांच की जिम्मेदारी इंजीनियर संतोष कुमार पांडे की है। मैंने सिर्फ 70 ड्रमों की संख्या गिनी, हर ड्रम में 200 किलो फिनायल दर्ज है।”
लेकिन जब इंजीनियर संतोष कुमार पांडे से दूरभाष पर पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो कई बार कॉल करने के बावजूद उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। यह चुप्पी और ज्यादा सवाल खड़े करती है—क्या नगर पालिका के अधिकारियों ने जानबूझकर गुणवत्ता जांच से बचने की कोशिश की है?
जिले के कलेक्टर धरनेंद्र जैन से इस मामले में पूछे जाने पर उन्होंने कहा—
“मुझे इसकी जानकारी नहीं थी। मामला अभी संज्ञान में आया है, मैं इसकी जांच करवाता हूँ।”
इधर नगर में यह चर्चा भी तेज है कि नगर पालिका में एक ऐसे व्यक्ति की चर्चा आम है, जो न तो कोई बड़ा अधिकारी है और न ही निर्वाचित पद पर, लेकिन स्थानीय लोग उसे अनौपचारिक तौर पर ‘भाईजान’ कहते हैं। कर्मचारियों का दावा है कि वास्तविक निर्णय उसी की सहमति के बिना लगभग कोई फाइल आगे नहीं बढ़ती—हर टेंडर, हर खरीद और भुगतान—सब कुछ उसके इशारों पर चलता है। अधिकारी और कर्मचारी भी इसे सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने से कतराते हैं, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इसके खिलाफ कोई मुंह खोलने पर सीधे परेशानी हो सकती है।
शहर के लोग अब यह जानना चाहते हैं कि नगर पालिका की कथित स्वच्छता योजनाओं के पीछे आखिर किसका खेल चल रहा है। ड्रमों पर लिक्विड ग्लूकोज़ की छपाई, बैरल पर ‘NA’ अंकित निर्माण व एक्सपायरी जानकारी, और MSDS/ISI का अभाव सीधे संकेत देते हैं कि मामला सिर्फ गलती का नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की प्रणालीगत बुनियाद का हिस्सा है।
स्थानीय सूत्रों का कहना है कि यदि जांच गहराई से की गई भ्रष्टाचारी के कई और “गुप्त खेल” उजागर हो सकते हैं—कागज़ों में दर्ज खरीद से लेकर असली सप्लाई तक का पूरा सच सामने आएगा।


