पैसे बचाने का सही तरीका: सस्ता नहीं, पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा लें
मुंबई: बढ़ती मेडिकल महंगाई और टैक्स राहत के बीच बड़े हेल्थ कवर की ओर बढ़ते भारतीय कदम
आज के इस बदलते परिवेश में केवल औपचारिकता के लिए स्वास्थ्य बीमा लेना समझदारी नहीं रह गया है। चिकित्सा जगत में हो रहे बदलावों और गंभीर बीमारियों के बढ़ते खतरों के बीच अब एक ऐसी पुख्ता पॉलिसी की आवश्यकता है, जो अस्पताल में भर्ती होने पर आपकी जमा-पूंजी को पूरी तरह सुरक्षित रखे। वह दौर अब अतीत की बात हो चुका है, जब पूरे कुनबे के लिए तीन या पांच लाख रुपये की पॉलिसी को पर्याप्त मान लिया जाता था। वर्तमान समय में स्वास्थ्य सेवाएं इतनी महंगी हो चुकी हैं कि पच्चीस लाख रुपये से कम का बीमा कवर भी बेहद छोटा नजर आने लगा है। असल में स्वास्थ्य बीमा की किस्त महंगी नहीं होती, बल्कि बिना किसी तैयारी के अस्पताल पहुंचना जेब पर भारी पड़ता है। यही वजह है कि अब बजट फ्रेंडली पॉलिसी ढूंढने के बजाय परिवार की वास्तविक आवश्यकताओं को देखते हुए एक बड़ा और मजबूत सुरक्षा कवच चुनना समय की मांग बन गया है।
चिकित्सा क्षेत्र में बढ़ती लागत का सीधा असर यह हुआ है कि लोगों को अब अपने पुराने और सीमित दायरे वाले इंश्योरेंस को अपग्रेड करना पड़ रहा है। आज के दौर में यदि कोई व्यक्ति किसी कॉर्पोरेट अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में दो-तीन दिन भी गुजारता है, तो पांच लाख रुपये की पूरी पॉलिसी का पैसा चुटकियों में खत्म हो जाता है। इस बीच सरकार द्वारा व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों पर लगने वाले अठारह प्रतिशत के वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को पूरी तरह समाप्त कर शून्य करने के फैसले ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया है। टैक्स हटने से प्रीमियम की राशि में भारी कमी आई है, जिसके चलते देश का आम नागरिक अब छोटी पॉलिसियों को अलविदा कहकर सीधे पचास लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक के सुपर टॉप-अप प्लान को तरजीह दे रहा है।
चिकित्सा लागत में बेतहाशा वृद्धि और छोटे बीमा कवर का सिमटता दायरा
देश के भीतर इलाज के खर्च में सालाना चौदह प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, जिसका सीधा मतलब है कि जो चिकित्सा सेवा पिछले वर्ष एक लाख रुपये में उपलब्ध थी, उसके लिए अब एक लाख चौदह हजार रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। यदि बात कैंसर, हृदय रोग या गुर्दे की गंभीर बीमारियों से जुड़ी सर्जरीज की हो, तो महानगरों के नामी अस्पतालों में यह खर्च बहुत ही आसानी से पंद्रह से पच्चीस लाख रुपये के आंकड़े को पार कर जाता है। ऐसी परिस्थितियों में बड़े शहरों में रहने वाले परिवारों के लिए पच्चीस लाख से पचास लाख रुपये तक का बेस कवर रखना कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है।
बीमा बाजार के हालिया रुझान भी इसी बदलाव की तस्दीक करते हैं। स्वास्थ्य बीमा से टैक्स का बोझ हटते ही भारतीय उपभोक्ताओं ने कम वैल्यू वाली पॉलिसियों से दूरी बनाना शुरू कर दिया है, जिसे पॉलिसीबाजार के पिछले आठ महीनों के आंकड़ों में साफ देखा जा सकता है।
बीमा बाजार में कवरेज की बदलती स्थिति:
| कवरेज की सीमा | टैक्स हटने से पहले का हिस्सा | वर्तमान हिस्सेदारी | बाजार की मौजूदा हलचल |
| 10 लाख रुपये से कम | 26% | 10% | इस वर्ग की मांग में भारी गिरावट आई है |
| 10 से 20 लाख रुपये | 61% | 62% | इस दायरे में स्थिति लगभग स्थिर बनी हुई है |
| 20 लाख से 1 करोड़ रुपये | 11% | 16% | इस सेगमेंट में लगातार मजबूती देखी जा रही है |
| 1 करोड़ रुपये से अधिक | 2% | 12% | इस उच्च वर्ग की मांग में छह गुना का उछाल आया है |
उपरोक्त आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि उपभोक्ता अब दूरदर्शी सोच के साथ बड़े रिस्क कवर को अपना रहे हैं, ताकि भविष्य की अनिश्चितताओं से निपटा जा सके।
बड़े रिस्क कवर की बढ़ती लोकप्रियता के मुख्य कारण और नियमों में नरमी
बाजार में इस बड़े बदलाव के पीछे मुख्य रूप से तीन वजहें काम कर रही हैं। सबसे पहला कारण टैक्स में मिली पूरी छूट है, जिसने महंगे प्रीमियम को आम आदमी के बजट में ला खड़ा किया है। दूसरी वजह यह है कि भारत में इलाज का सामान्य खर्च हर पांच से सात साल में दोगुना हो जाता है, और सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक आज भी स्वास्थ्य पर होने वाले कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा लोगों को कर्ज लेकर या अपनी जेब से देना पड़ता है। तीसरा कारण यह है कि अधिकांश कॉर्पोरेट कंपनियां अपने कर्मचारियों को जो ग्रुप इंश्योरेंस देती हैं, उसकी सीमा बेहद सीमित होती है, जिसके कारण लोग व्यक्तिगत तौर पर बड़ा कवर लेना सुरक्षित समझ रहे हैं।
इसके साथ ही नियामक संस्थाओं और बीमा कंपनियों ने भी नियमों को पहले से कहीं अधिक उपभोक्ता अनुकूल बना दिया है। अब नए नियम के तहत पॉलिसी खरीदने के लिए उम्र की कोई अधिकतम सीमा तय नहीं है, जिससे पैंसठ वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग भी आसानी से नई पॉलिसी ले सकते हैं। इसके अलावा पुरानी बीमारियों के लिए दी जाने वाली प्रतीक्षा अवधि (वेटिंग पीरियड) को भी चार साल से घटाकर तीन साल कर दिया गया है। आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों जैसे रोबोटिक सर्जरी, स्टेम सेल थेरेपी और ओपीडी के खर्चों को भी अब नई पॉलिसियों के दायरे में शामिल किया जा रहा है, जिससे उपभोक्ताओं को चौतरफा सुरक्षा मिल रही है।
पॉलिसी नवीनीकरण के समय ध्यान देने योग्य बातें और आदर्श पोर्टफोलियो
वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आप अभी भी किसी पुरानी और छोटी पॉलिसी के भरोसे बैठे हैं, तो टैक्स में मिली रियायत का लाभ उठाते हुए उसे तुरंत अपग्रेड करने का यह सबसे बेहतरीन मौका है। इसके लिए आपको अपना बेस प्लान बदलने की भी जरूरत नहीं है, बल्कि एक किफायती सुपर टॉप-अप प्लान जोड़कर आप अपने कुल कवर को एक करोड़ रुपये तक आसानी से पहुंचा सकते हैं। पॉलिसी का नवीनीकरण (रिन्यूअल) करते समय हमेशा नियमों को बारीकी से पढ़ना चाहिए क्योंकि कंपनियां अक्सर शर्तों में बदलाव करती रहती हैं। आपको विशेष रूप से यह देखना चाहिए कि रूम रेंट पर कोई 'सब-लिमिट' तो नहीं लगी है, और अस्पताल के बिल में शामिल होने वाले दस्ताने, मास्क और पीपीई किट जैसे 'कंज्यूमेबल्स' के खर्चों के लिए अलग से राइडर मौजूद है या नहीं। साथ ही, 'अनलिमिटेड रीस्टोर' की सुविधा लेना भी फायदेमंद रहता है ताकि एक ही साल में परिवार के कई सदस्यों के बीमार होने पर भी फंड कम न पड़े।
निवेश और सुरक्षा का यह गणित पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस शहर में रहते हैं और आपके परिवार की संरचना कैसी है। इसे एक व्यवस्थित योजना के तहत समझा जा सकता है।
शहरी परिवेश और परिवार के अनुसार आवश्यक बीमा राशि:
| परिवार का ढांचा | निवास स्थान का प्रकार | न्यूनतम अनुशंसित कवर |
| युवा एवं अविवाहित | टियर 2 या टियर 3 शहर | 15 लाख से 20 लाख रुपये |
| पूर्ण परिवार (पति-पत्नी और दो बच्चे) | मेट्रो शहर (जैसे दिल्ली या मुंबई) | 25 लाख से 50 लाख रुपये |
| वरिष्ठ नागरिक (बुजुर्ग दंपत्ति) | देश का कोई भी क्षेत्र | 25 लाख बेस कवर + 50 लाख का सुपर टॉप-अप |
इस वर्गीकरण से साफ है कि छोटे शहरों में रहने वाले युवाओं के लिए भले ही बीस लाख तक का कवर काम कर जाए, लेकिन महानगरों के परिवारों और स्वास्थ्य के मोर्चे पर संवेदनशील बुजुर्गों के लिए एक बड़ा बेस कवर और उसके साथ सुपर टॉप-अप का सुरक्षा तंत्र होना बेहद जरूरी है। अंततः समझदारी इसी में है कि अपनी कुल इक्विटी या वित्तीय योजनाओं के साथ-साथ एक मजबूत हेल्थ पोर्टफोलियो तैयार किया जाए, जो संकट के समय आपकी संचित पूंजी को बिखरने से बचा सके।


