ट्रेन और मेरी सामने की बाजू वाली वो सीट
ट्रेन - सफर था और सफर ऐसा की अनायास ही मन मे कौतूहल का बाजार गर्म होने लगा और कई विचार मन मे हिलोरे मारने लगे काफी समझाया कि समझ लो पर हिलोरे है कि मानने को तैयार नही,अनायास ही उस जोड़े पर नजर जा पड़ती जो दूर दूर से कही भी एक दूसरे के न होते हुए भी एक दूसरे के हो गये थे ये मेरे मन की भ्रांति भी हो सकती है पर मन के हिलोरों  को लाख रोकने की कोशिश के बावजूद न रोक सका या यूं कहूँ की उनकी हरकतों ने विचलती कर दिया कि आखिर क्या हो गया संस्कारो के भारत को
दरसल मेरे सामने वाली सीट के बाजू वाली सीट पर पहले तो एक नवजवान सवार होता है सिंघम स्टाइल की मूछे छोटी कद काठी और उसके ऊपर खाखी और सर्द मौसम अपने आप मे मनमोहक सफर था गुजरते स्टेशनो के बीच किसी एक स्टेशन से एक खूबसूरत युवती का पदार्पण होना सुर्ख ओढ़े ठंड की दस्तक की तरह बोगी में सवार होते ही प्यारी मुस्कान से सफर को ट्रेन की स्पीड से दौड़ाता रहा  और मेरी सामने वाली सीट की बाजू वाली सीट के ऊपर की सीट सायद उस युवती की थी  जो नीचे वाले खाखी के बाबू के मन मे मनमोहक पैदा कर उन्हें बेचैन कर रही थी पर युवती की सीट ऊपर की थी सफर दिन का था सो युवती ने खाखी वाले बाबू के सीट पे ही अपना स्थान जमाया बैग पैक सब ऊपर और मोर मोरनी नीचे की सीट पर लगभग 4,5 घण्टे के सफर के दौरान दोनों में गुम सुम खामोशियों भरा कटा और शाम ढलते ही ट्रेनों की जलती लाइट ने इन दोनों में मची खामोशियो को तोड़ते हुए प्रगाढ़ मित्रता की तरफ बढ़ने का एक साफ इशारा था पर हम भी कहाँ कम थे ठहरे जो कलमदार नजरें हर पल को कलम में कैद करने की फिराक में थे और ट्रेन की झुक झुक की आवाजों के बीच सुख दुख बांटने के शब्द कानों में न चाहते हुए भी सुनाई दे रहे थे  और सफर चलता गया चलता गया रात के लगभग 9 बजे ट्रेन के पहिये चायं चायं करते हुए जबलपुर स्टेशन में थम गये और कानों को थोड़ा राहत हुई पर यहां तक नजदीकियां इतनी बढ़ गई थी कि खाखी धारी सिंघम स्टाइल के मूछों वाले बाबू मूछों पर ताव लगाते हुए स्टेशन के प्लेट फॉर्म तरफ निकले और लौटे तो अपने कुछ खाने के इंतजामात के साथ पर सायद टूटी खामोशियों के बीच के रिश्ते को न भूलते हुए खाखी वाले युवक ने उस युवती के लिए भी पेट पूजा के व्यवस्था के साथ वापस ट्रेन में दाखिल हुए तो पहले तो क्यों परेशान हुए आप जैसे कई संबोधनों से संबोधित करते हुए युवती ने खाखी वाले सिंघम मूंछों वाले युवक को तसल्ली भरे नजरों से देखा और फिर पेट पूजा हुई और एक तरफ सुखद अनुवभव था कि इस दुनिया मे लोग एक दूसरे का ख्याल अब भी रखते है और खाना पीना खाते खाते ट्रेन फिर झुक झुक करती हुई अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी थी और ट्रेन में मीले दो अंजान भी अपनी दुनिया के सपनो को एक दूसरे से साझा करते हुए आप के बॉयफ्रेंड है कहाँ है वगैरा वगैरा आप का क्या है मेरे गर्लफ्रेंड् ही मेरी बीवी है जैसी बातों का दौर चलता रहा लगभग रात के 12 बजने को आये पर आंखों में नींद आने का नाम नही ले रही थी पता नही मेरे दिमाग मे कीचड़ था या दोनों की हँसी ने नीद उड़ा रखी थी या दोनों को एक दूसरे के करीब होते सुनना नीद को उड़ा रहा था
एक तरफ युवक के बताए अनुसार कहूँ या मेरी गलतियों की वजह से जो आवाजे मेरे कानों में पड़ी उनकी गुस्ताखियां कहूँ  पर तब तक इतना तो तय हो चुका था कि दो अजनबी अब अजनबी नही रह गये थे
ट्रेन के पहियों के आवाजों के बीच एक दूसरे के कानाफूसी की आवजे बता रही थी कि अब दोनो सायद बेगाने न रह गए और सफर शुरू हुआ मोबाइल नंबर लेने देने के सफर से और हंसी के ठहाकों के बीच सर्द हवाओं के बीच दोनो ही एक दूसरे के दिल की दिल से सुन कर मुस्कुरा रहे थे तो युवक भी सायद युवती पर आकर्षित हो चुके थे और आप प्यार इजहार भी रात के आगोश में शमाते हुए दोनों को एक दूसरे की तरफ आकार्षित कर रहा था तो दूसरी तरफ नींद मुझे बेचैन कर रही थी
थोड़ी और सफर आगे बढ़ा और ठंडक ने दस्तक दी और मैं अपनी बैग से ब्लैंकेट निकाल कर अपने आप को ढकने का प्रयास करते हुए लेटा रहा और मेरी सामने वाली सीट के बाजू वाली सीट पर दो प्यार के परिंदे गुटर गु करते हुए मेरी भी नींद खराब करते रहे 
अब दोनों के रिश्ते प्रगाढ़ता के सफर पर चलते हुए प्यार के इजहार को ट्रेन के पहियों के आवाज को बौना साबित करते हुए प्यार की गूंज से गुंजायमान हो रहा था और फियूचर कहूँ या इनके फितूर के सपने पालने कहानी सुनते हुए मेरी आँखें गड़ने लगी थी और लगातार सोने की कोशिस करने के बावजूद भी सो न सका और दोनों के बीच दुनिया भर के सपनो भरी सपनो की कहानियां जागती हुई आंखों से देखते हुए लगा कि क्या वाकई में इतनी जल्दी कोई एक दूसरे का हो जाता है या ये उनके मन का फितूर था कि ट्रेन से शुरू हुआ ये सफर दोनो को मंजिल तक पंहुचाते हुए प्यार को परवान चढ़ायेगा पर मुझे ट्रेन के पहियों की झिक झिक करती आवाज बता रही थी कि हम इस झिक झिक भरी आबाज के बीच भी जिंदगी के दो पल सुकून और प्यार के लोग कहीं भी कभी भी ढूंढ लेते है तो दूसरी तरफ मन मे उठ रही हिलोरें ये भी सोचने को मजबूर कर रही थी कि आखिर कहां जा रहे है हम की चंद मिनटों की मनगढ़ंत कहानी सुन सुना कर लोग एक दूसरे के करीब आ जाते है या ये उनके सफर का सफर की तरह काटने का अंदाज है पर मेरे हिसाब से जो भी हो निहायत बेहियत और बेमुर्दा पन था उसके बाद भी सोचता रहा कि आज के युवाओं के मानसिक दिवालिये पन की ये तस्वीरें मेरे भारत के संस्कारों को कहां ले जा रही है और तभी अचानक फिर ट्रेन के पहियों की आवाज चायं चायं करते हुए भोपाल स्टेशन में रुकी और मानो ये पल हर तरफ सन्नाटे से भरा खामोशियों के बीच सन्न रह गया  जब युवती ट्रेन से धीरे धीरे मानो न चाहते हुए भी अपने कदम बढ़ाते हुए ट्रेन के नीचे उतरी और युवक भी अनमने मन से रुंधे हुए गले से अलविदा करने गेट तक आया तब हम भी अपना बैग उठा कर अपने गंतव्य की ओर निकला तो अचानक फिर नजर उस युवती पर पड़ गई पर अब वो अकेली थी सायद मोहतरमा भी अपनी मंजिलों की तरफ बढ़ गई होंगी कहीं ,बहरहाल जो भी वो मेरी नींद खराब हो चुकी है पर ईश्वर दोनो का ट्रेन प्यार आजीवन बनाये रखे पर इतनी गुजारिस है आप सफर के दौरान दूसरों की तकलीफों का ध्यान भी रखे और प्यार नुमाईश की चीज नही पर आप दोनो को मुबारक हो ट्रेन के झुक झुक पहियों के आवाजों के बीच शुरू हुए प्यार के सफर को आगे भी गती मीले और आप दोनों ट्रेन की पटरियों की तरह एक दूसरे के तो रहे पर कभी एक न हो पाएं ताकि कभी किस और मुसाफिर को इस तरह रात भर जाग के तकलीफ न उठानी पड़े