ट्विंकल मैं तुम्हारा पिता और वो दरिंदे- विजय उरमलिया की कलम से

अनूपपुर - ट्विंकल मैं और तुम एक लेख नही पिता पुत्री और दरिंदगी की वो दास्ताँ है जहां चंद दिनों तक खूब लांछन होगा,चिल्ला चोटी होगी नही होगी तो मेरी ट्विंकल,देश के कोने कोने से ले कर शोशल मीडिया में एक ही नाम ट्विंकल और ये नाम मुझे सोने नही देता आंखें है कि अब रोने नही देती सुख गई पथरा गई, पर हैवानियत ने जब अपना प्रचंड रूप दिखाया तो देश ही नही दुनिया को शर्माया, पर दरिंदगी के कारिंदों को जरा भी बिटिया ट्विंकल पर रहम न आया,

शोसल मीडिया में मजहब और जाति धर्म,अमीरी गरीबी का खूब रेला है अरे जानकारों दरिंदगी मजहब और अमीरी गरीबी देख नही आती मेरी ट्विकंल की रूह को तड़पने वाले तो हमारे जैसे  इंसान के रूप में भेड़िये थे,मर गया संस्कार मर गई रूह मर गया जमीर और इनके मरने से मर गई मेरी ट्विंकल ,
हैवानो का बसेरा है अब तो किसी ट्विकंल के लिए लगता है इस देश मे न सवेरा है हर गली में दरिंदो की राहनुमाइस है कोई बताये किन गलियों से हो निकले ट्विंकल

 इस देश ने कई ट्विंकल खोई पर धन्य है मुआवजे की सरकारें,सेना में जवान सहीद हो तो मुआवजा,दवाइयों में भरष्टचार और फिर  मौत तो मुआवजा,ऊपर वाले के प्रकोप का मुआवजा किसान को हर बात का मुआवजा मेरी बिटिया ट्विंकल का भी मुआवजा ऐसी कई मेरी बेटियों के रुदन का मुआवजा आखिर कब तक ये मुआवजा चलेगा मुआवजा नही संस्कार दीजिये देश को संस्कार मजहब के बीज मत बोइये संस्कार के बीज बोइये
किसी की सरकार हो कही किसी प्रदेश में जब तक हम अपने देश मे संस्करों के बीज नही बोयेंगे तो मेरी हर बेटी निर्भया, और ट्विंकल की मौत मरेगी और चार दिन चिल्ला चोटी फिर खामोशी अगले ट्विंकल ,निर्भया कांड के आने तक,
क्या कोई सरकार या कोई नेता कभी ये दावा करता है कि हम चुनाव जीत कर आयेंगे और देश मे राजनीत नही संस्कार के फसल बोयेंगे नही हो सकता न साहब नही हो सकता नही ये नेता एक दूसरे पर कीचड़ कैसे उछालेंगे अरे आप के कीचड़ के खेल ने कई मासूमो को उजाड़ दिया 
और तुम सांत्वना देते रहे 

फांसी की सजा नही रोक सकती बिटिया ट्विंकल, निर्भया कांड
आप किसी गुनाह की कितनी बड़ी सजा दे दो और आप की तिजोरी में मौत से बड़ी सजा भी नही होगी पर दावा है हर ट्विंकल के उस पिता का की तुम्हारी ये सजायें इस घ्रणित,घिनौनी,जघन्य, क्या नाम दूं सब कम है को तब तक नही रोक पायेंगी जब तक देश मे मजहब और भाई चारे के संस्कारों का दफन होता रहेगा आज संस्कारों के दफन होने से मजहब पैदा हो गया मजहब पैदा होने से पड़ोसी पड़ोसी क न रहा, पहले भी इसी देश मे हर धर्म,जाती,हर प्रान्त के लोग बस्ते थे पर संस्कारों के वो बीज बोए जाते थे की पड़ोसी का बेटा बेटी पड़ोसी से पिता से ज्यादा डरते थे ये कोई डर नही था संस्कार थे और तब का पड़ोसी पड़ोसी के बेटे बेटियों को अपना बेटा बेटी मानते थे संस्कार थे साहब संस्कार तब कोई ट्विंकल न हुआ तब कोई निर्भया न हुआ पता है क्यों तब संस्कारो की खेती हुई थी मजहब,और आरक्षण की नही 
हमे विकासः नही संस्कारों वाला देश चाहिए मुझे नही अब कोई ट्विंकल,और निर्भया चाहिये देश की हर बेटियां मेरी बेटीयाँ होनी चाहिए ऐसा संस्कारो का बीज बोइये