कभी भी भगवान अपने भक्तों को मुसीबत के समय अकेला नहीं छोड़ते। वह किसी न किसी रूप में आकर भक्तों को हर समस्या से बचने का रास्ता दे ही देते हैं। मगर, कई बार ऐसा होता है कि जब हम किसी मुसीबत में होते हैं, तो कई सारे ज्योतिषीय उपाय करते हैं।
इंदौर के ज्योतिषी पंडित खेमराज शर्मा ने बताते हैं कि लोग सारे मंदिर, धर्मस्थल के दर्शन करने जाते हैं। इसके बाद भी उन्हें पूजा-पाठ का भी असर होता नहीं दिखता है। कष्टों में कमी नहीं दिखती है। तब उनके मन में अक्सर ख्याल आता है कि इतना सब करना व्यर्थ है।
अब जरा यह सोचिए कि इतनी पूजा, ज्योतिषीय उपाय आदि के बाद भी आपको लग रहा है कि कष्टों में कमी नहीं आ रही है। तो यदि आपने ईश्वर का ध्यान नहीं किया होता, उनकी उपासना नहीं की होती और यदि ईश्वर आपकी मदद को नहीं आए होते, तो क्या होता।

इस मामले में मदभागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है-
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌॥
जो अनन्यप्रेमी भक्तजन दुनियाभर की चिंता छोड़कर मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूं॥ यानी उनके लिए सबसे बेहतर का मार्ग मैं ही प्रशस्त कर देता हूं।

इसका अर्थ यह कतई नहीं हैं कि आप जैसा सोच रहे हैं, वैसी अनुकूल दशा आपके लिए भगवान बना देंगे। वह वैसी स्थितियां आपके अनुकूल कर देंगे, जो धर्म-कर्म की और प्रकृति की दृष्टि से सही हो।
पंडित खेमराज कहते हैं कि नीतिगत, सही कार्य करने वाले को यह ख्याल मन में रखना चाहिए-

अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में। अब जीत तुम्हारे हाथों में और हार तुम्हारे हाथों में।
मेरा निश्चय बस एक यही, एक बार तुम्हें मैं पा जाऊं। अर्पण कर दूं दुनिया भर का सब प्यार तुम्हारे हाथों में॥

इसके बाद आपको कुछ करने की जरूरत नहीं है। आपके सब योगक्षेम यानी कुशल-मंगल की जिम्मेदारी वैसे ही भगवान की होगी, जैसी महाभारत के युद्ध में अर्जुन की विजय की जिम्मेदारी श्रीकृष्ण ने ले रखी थी। वह रथ के सारथी ही नहीं थे, बल्कि युद्ध में हर दिन पांडवों की रणनीति क्या होगी इसकी जिम्मेदारी भी उनकी थी।

तभी तो अर्जुन अपने शिविर में जब आराम से सो रहे होते थे, तो कृष्ण अगले दिन की युद्ध की योजना बनाते थे। उसी तरह जब आप भी आपने जीवन की डोर प्रभु के हाथों में सौंप देंगे, तो वह निश्चित ही आपको युक्ति युक्त राह पर खुद ही ले चलने के लिए तैयार हो जाएंगे।